शिमला/शैल। सातवें चरण के मतदान के साथ ही चुनावी प्रक्रिया का एक सबसे बड़ा हिस्सा पूरा हो गया है। अब केवल मतगणना और उसका परिणाम शेष है। अन्तिम चरण का चुनाव प्रचार थमने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह ने पार्टी मुख्यालय में एक पत्रकार वार्ता को भी संबोधित किया। इस संबोधन में प्रधानमंत्री ने एक तरह से अपने ही मन की बात इस वार्ता में रखी क्योंकि उन्हांने पत्रकारों का एक भी सवाल नही लिया और जब सवाल ही नही लिया तो जवाब का प्रश्न ही नही उठता। हां इस पत्रकार वार्ता में प्रधानमन्त्री ने देश की जनता
का धन्यवाद किया और दावा किया कि वह पुनः पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापिस आ रहे हैं। प्रधानमंत्री का यह दावा कितना पूरा होता है यह परिणाम आने पर ही पता लगेगा। लेकिन इस वार्ता में जिस तरह से प्रधानमंत्री को प्रज्ञा ठाकुर के गोडसे को देशभक्त बताने वाले ब्यान पर निरूत्तर होना पड़ा है। उससे भाजपा का जो चेहरा देश के सामने आया है उसने पूरे चुनाव और उसके परिणामों पर एक गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है।
इस पृष्ठभूमि में यदि पूरे चुनाव का आकलन किया जाये तो सबसे पहले यह सामने आता है कि चुनाव भाजपा में केवल दो व्यक्तियों प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष के गिर्द ही केन्द्रित रहा है। इसी के साथ यह भी सामने आया है कि इस चुनाव में पार्टी ने प्रिन्ट मीडिया की बजाये सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर ज्यादा निर्भरता रखी। तीसरा तथ्य यह रहा है कि भाजपा ने चुनाव में आम आदमी के मुद्दों बेरोज़गारी, मंहगाई और भ्रष्टाचार को अपने प्रचार में कहीं भी केन्द्र में नही आने दिया। भाजपा के एक भी स्टार प्रचारक ने इन मुद्दों पर न तो अपने चुनावी भाषणों में और न ही पत्रकार वार्ताओं में चर्चा में आने दिया। जबकि कांग्रेस ने इन्ही मुद्दों पर सबसे ज्यादा अपने को केन्द्रित रखा। भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र में भी इन मुद्दों को प्रमुखता नही दी गयी है। जबकि कांग्रेस के घोषणा पत्र का केन्द्र बिन्दु ही यही मुद्दे हैं। भाजपा हर चरण के साथ मुद्दे बदलती रही है और अन्त तक आते-आते उसने विपक्ष की गालीयों की गिनती भी जनता के सामने मुद्दा बनाकर पेश कर दिया। इस चुनाव में प्रधानमंत्री ने बालाकोट की एयर स्ट्राईक, सर्जिकल स्ट्राईक, जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के खिलाफ कारवाई, राष्ट्रवाद और प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाकर ‘‘भगवा आतंकवाद’’ के सम्बोधन को मुद्दा बनाकर हिन्दुवोटों का ध्रुवीकरण करने के प्रयास के गिर्द ही पूरे चुनाव प्रचार को केन्द्रित रखा है। इसलिये यह आकलन करना महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस ध्रुवीकरण का अन्तिम परिणाम क्या हो सकता है।
इस ध्रुवीकरण का आकलन करने से पहले 2014 के चुनावों से लेकर अब तक के घटनाक्रमों पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है। 2014 के चुनावों से पहले कालेधन और भ्रष्टाचार को लेकर जो जनधारणा रामदेव और अन्ना हजा़रे के आन्दोलनों के माध्यम से तैयार हुई थी उसका सबसे अधिक लाभ भाजपा को मिला था क्योंकि इस जनधारणा को ‘अच्छे दिनों ’’ का भरोसा दिखाया गया था। लेकिन आज न तो अच्छे दिन ही आये हैं और न ही रामदेव और अन्ना के आन्दोलन हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद जितने विधानसभा चुनाव हुए हैं उनमें भाजपा को हरियाणा, उत्तराखण्ड और हिमाचल को छोड़कर कहीं भी अपने दम पर बहुमत नही मिला है। जहां भी भाजपा ने सरकारें बनायी हैं वहां चुनाव परिणामों के बाद गठबंधन बनाये गये और तब सरकारें बनी। बिहार में लालू-नितिश के गठबन्धन को तोड़कर भाजपा-नितिश गठबन्धन सत्ता में आया। उत्तरप्रदेश में हिन्दु-मुस्लिम धु्रवीकरण से प्रदेश में सरकार बनी लेकिन जैसे ही इस धु्रुवीकरण की राजनीति को समझकर सपा-बसपा एक हुए वैसे ही उत्तर प्रदेश उपचुनाव भाजपा हार गयी 2014 के बाद लोकसभा का हर उपचुनाव भाजपा हारी है यह एक तथ्य है। इसके बाद गुजरात और कर्नाटक में कांग्रेस की स्थिति सुधरी। कर्नाटक में तो जेडी(एस) और कांग्रेस ने सरकार बना ली। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीगढ़ की सरकारें भाजपा के हाथ से निकल गयी। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि 2014 के चुनावों के बाद से मतदाता लगातार भाजपा से दूर होता गया है।
भाजपा का सबसे बड़ा शक्ति केन्द्र आरएसएस है। क्योंकि भाजपा संघ परिवार की एक राजनीतिक ईकाई है। संघ का पूरा विचार-दर्शन हिन्दुत्व के गिर्द केन्द्रित है यह सब जानते हैं। इस विचार-दर्शन की सफलता के लिये सघं के सैंकड़ो कार्यकर्ताओं ने अपनी गृहस्थी तक नही बसाई है। मुस्लिम समुदाय को लेकर संघ का अपना एक विशेष विचार दर्शन और धारणा है यह सब जानते हैं। इस धारणा से कितने सहमत भी हैं यह एक अलग प्रश्न है। लेकिन इस धारणा के प्रतीक रूप में सामने आये मुद्दे अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाना और मुस्लिमों पर युनिफाईड सिविल कोड लागू करना हर स्वयं सेवक का प्रमुख मुद्दा रहा है। दिसम्बर 1992 में इसी राम मन्दिर के निर्माण के लिये भाजपा ने अपनी राज्य सरकारों की आहूति दे दी थी। 1992 के बाद से राम मन्दिर हर चुनाव में मुख्य मुद्दा रहा है। 2014 के चुनाव में भी था। इसी हिन्दुत्व के ऐजैण्डे पर भाजपा को अपने ही तौर 283 सीटें मिल गयी थी और पूरा एनडीए 332 तक पंहुच गया था। 2014 में जो बहुमत भाजपा को मिला था वह शायद निकट भविष्य में दूसरी बार नही मिलेगा। लेकिन इतने प्रचण्ड बहुमत के बाद भी भाजपा हिन्दु ऐजैण्डे के एक भी मुद्दे को अमली शक्ल नही दे पायी है। जिस तीन तलाक के बिल को लोकसभा में पास करवाया उसे बाद में राज्यसभा में पेश नही किया गया। इस तरह मोदी सरकार में संघ को सबसे आहत के रूप में देखा जा रहा है। क्योंकि संघ के कार्यकर्ताओं ने ही सरकार की नीयत और नीति पर सवाल उठाने शुरू कर दिये हैं। शायद इन्ही सवालों के कारण पिछले कुछ अरसे से टीवी चैनलों की बहस में संघ के बुद्धिजिवि नही देखे जा रहे हैं। बल्कि संघ प्रमुख मोहन भागवत और राम माधव के ब्यानां को भी इसी सबका परिणाम माना जा रहा है। क्योंकि जो बहुमत इस बार मोदी के पास था उससे किसी भी ऐजैण्डे को कार्य रूप देना बहुत सहज था। इस तरह यदि मोदी सरकार के काम काज पर इस दृष्टि से नजर डाली जाये तो यह लगता है कि शायद इस बार मोदी पुनःप्रधानमन्त्री न बन पाये।
शिमला/शैल। केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जगत प्रकाश नड्डा की प्रदेश के चुनाव में इस बार ज्यादा सक्रिय भूमिका नही रह पायी है जबकि वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। यहां तक चर्चा है कि शाह के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हो सकते हैं। इस पृष्ठभूमि को सामने रखते हुए यह स्वभाविक है कि प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिये जितना अधिक समय वह देंगे उससे पार्टी को लाभ ही मिलेगा क्योंकि वह हिमाचल से ही हैं
बिलासपुर उनका अपना जिला है। लेकिन इसी जिले से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और तीन बार सांसद रहे सुरेश चन्देल इन चुनावों में कांग्रेस में शामिल हो गये हैं। सुरेश चन्देल जब भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए थे तब तक बिलासपुर के कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं का सोशल मीडिया में यह नारा ‘‘नड्डा तुझसे बैर नही अनुराग तेरी खेरी नही’’ काफी चर्चा का विषय बना रहा है। नड्डा प्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं लेकिन उनकी सांसद निधि का बहुत बड़ा भाग हमीरपुर के नादौन ब्लॉक में बंटा है। नादौन से भाजपा के विजय अग्निहोत्री एक बार विधायक रह चुके हैं। 2017 का चुनाव हारने के बाद वह हमीरपुर जिले से पार्टी अध्यक्ष बना दिये गये है। नड्डा की सांसद निधि के वितरण के जो आंकड़े आरटीआई के माध्यम से बाहर आये हैं उनके मुताबिक अग्निहोत्री को नड्डा की सबसे अधिक स्पोर्ट हासिल है। अन्गिहोत्री के रिश्ते धूमल के साथ कोई बहुत अच्छे नही माने जाते हैं। हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में ही ऊना जिला आता है। ऊना के पूर्व विधायक सतपाल सत्ती भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं। लेकिन सत्ती प्रदेश भाजपा के अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हे अपने ब्यान के लिये चुनाव आयोग का 48 घन्टे का चुनाव प्रचार प्रतिबन्ध सहना पड़ा है। सत्ती ने राधा स्वामी संतंसग ब्यास के अनुयायीयों को लेकर जो टिप्पणी की थी उसकी नाराज़गी इस समुदाय के लोगों में अभी तक शान्त नही हुई है। राधा स्वामी समुदाय का हमीरपुर और कांगड़ा के संसदीय क्षेत्रों में बहुत प्रभाव है और चुनावों में इनकी नाराजगी भारी पड़ सकती है।
इस समय प्रदेश में चुनाव प्रचार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी स्वयं मुख्यमंत्री जयराम पर है। वही इस समय पूरी बागडोर संभाले हुए हैं और पूरे प्रदेश में घूम रहे हैं। उनके अपने गृह जिले और संसदीय क्षेत्रा मण्डी से ताल्लुक रखने वाले पंडित सुखराम कांग्रेस में वापसी कर चुके हैं और उनका पौत्र आश्रय शर्मा यहां से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ रहा है। आश्रय के पिता अनिल शर्मा जयराम के ऊर्जा मंत्री थे। इनका मन्त्रीपद जयराम ने आश्रय के कांग्रेस का उम्मीदवार बनने के बाद छीना है। पंडित सुखराम केन्द्र में दूर संचार मन्त्री रहे हैं और इस नाते दूर संचार की जो सुविधा/सेवा उन्होने प्रदेश के हर गांव तक पहुंचाई है उसके लिये प्रदेश में उनका एक अपना अलग स्थान बन चुका है। 2017 में मण्डी जिले की दस में से नौ सीटें भाजपा ने उन्ही के सहारे जीती हैं यह सब मानते हैं। ऐसे में चुनावों के वक्त पर सुखराम और सुरेश चन्देल का भाजपा को छोड़कर जाना पार्टी और जयराम दोनों के लिये नुकसानदेह साबित हो सकता है क्योंकि सभी ने अपनी उपेक्षा होने का आरोप लगाया है। सरकार बनने के बाद सबके मान सम्मान का ख्याल रखना मुख्यमन्त्रा की अपनी जिम्मेदारी बन जाता है और इसमें निश्चित रूप से जयराम काफी कमजोर साबित हुए हैं।
सरकार बनने के बाद जयराम के अपने चुनाव क्षेत्रा में एसडीएम कार्यालय को लेकर जो विवाद उठा था उस विवाद में धूमल और जयराम के राजनीतिक रिश्तो में दरार आ गयी थी। इस विवाद को हवा देने में धूमल का नाम लग गया था। यह नाम लगने पर धूमल को यहां तक कहना पड़ गया था कि सरकार चाहे तो इसमें सीआईडी से जांच करवा ले। विधानसभा का चुनाव धूमल को नेता घोषित करके लड़ा गया था। लेकिन संयोगवश धूमल स्वयं और उनके कई अन्य विश्वस्त चुनाव हार गये। लेकिन इस हार के वाबजूद विधायकां का बहुमत उनको मुख्यमन्त्री बनाना चाहता था। दो विधायकों ने तो उनके लिये सीट छोड़ने की ऑफर कर दी थी। धूमल की हार के बाद मुख्यमन्त्री पद के लिये नड्डा का नाम सबसे ऊपर चल रहा था। नड्डा के समर्थक पूरी तरह तैयार होकर आ गये थे। लेकिन जयराम के जयपूर संबंधो ने सारा खेल बदल दिया। इस गेम में भले ही जयराम जीत गये लेकिन इसमें जो विसात बिछ गयी थी अभी तक सीमटी नही है। सभी अपना-अपना दांव खेलने की फिराक में हैं। क्योंकि पार्टी के अन्दर न केवल जयराम के समकक्ष ही कुछ लोग हैं बलिक कई उनसे वरिष्ठ भी हैं। फिर मुख्यमन्त्री बनने की ईच्छा तो हर विधायक और सांसद में होना स्वभाविक है। अपनी ईच्छाओं को रणनीतिक सफलता देने के लिये चुनावों से ज्यादा अच्छा अवसर कोई नही होता है यह सब जानते हैं।
कांगड़ा में शान्ता कुमार इस बार चुनाव लड़ना चाहते थे यह सर्वविदित है लेकिन जिस ढंग से उन्हें चुनाव से हटाया गया है उसकी पीड़ा वह जगजाहिर कर चुके हैं। शान्ता कुमार ने भी सोनिया गांधी की 2004 की शाईनिंग इण्डिया टिप्पणी का समर्थन किया है। इस समर्थन के भी राजनीतिक मायने अलग हैं। इसी तरह सोफत के भाजपा में शामिल होने के बाद उनके विश्वस्त पवन ठाकुर द्वारा बिन्दल के खिलाफ उच्च न्यायालय में याकिचा दायर किये जाने को भी राजनीतिक हल्को में जयराम के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। फिर राष्ट्रीय स्तर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का यह कथन कि अब हर पांच साल बाद सरकार बदल जाती है तथा राम माधव का यह कहना कि भाजपा सहयोगीयों के साथ मिलकर सरकार बना लेगी और गडकरी का यह कहना कि अगला प्रधानमन्त्री भाजपा का नही बल्कि एनडी का होगा यह वक्तव्य अपने में बहुत कुछ कह जाते हैं। क्योंकि जब शीर्ष से भी ऐसे अस्पष्ट से ब्यान आने लग जाते हैं तब बार्डर लाईन पर बैठे हुए विरोधीयों और विद्रोहीयों को खुलकर खेलने का मौका मिल जाता है। राजनीतिक विश्लेषको की नजर में इसमें जयराम प्रदेश में इसी दौर में से गुजर रहे हैं और इससे उनका आने वाला राजनीतिक सफर काफी कठिन हो सकता है।
इस परिदृश्य में नड्डा की भूमिका को लेकर प्रदेश के राजनीतिक हल्कां में सवाल उठने स्वभाविक हैं क्योंकि नड्डा को प्रदेश के मुख्यमन्त्री के पद के लिये जयराम से ज्यादा बड़ा दावेदार माना जा रहा है। इस दावेदारी के चलते नड्डा का प्रदेश के चुनाव से बाहर रहना नड्डा और जयराम दोनां की अपनी अपनी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। लेकिन अब जब अमितशाह ने चुनाव जीतने के बाद अनुराग को बड़ी जिम्मेदारी देने की घोषणा कर दी है तब अनुराग का नाम भी नड्डा और जयराम के साथ प्रदेश के बडे़ पद के लिये जुड़ जाता है। ऐसे में एक और दावेदार का खड़ा हो जाना पूरे राजनीतिक परिदृश्य और जटिल बना देता है। इसलिये माना जा रहा है कि अपरोक्ष में छिड़ी दावेदारों की यह जंग इस चुनाव में पार्टी की सफलता पर ग्रहण का कारण न बन जाये।
शिमला/शैल। कानून के निर्माता और विकास के प्रतीक होते हैं हमारे सांसद यह आम की धारणा है। इस धारणा पर कौन कितना खरा उतरता है इसका आंकलन करने के लिये कोई कसौटी नही बन पायी है। जहां इन लोगों को कानून के निर्माताओं की संज्ञा दी जाती है वहीं पर एक कड़वा सत्य यह भी है कि विधानसभाओं से लेकर संसद तक गंभीर आपराधिक छवि तक के लोग जनता द्वारा चयनित होकर संसद में माननीय हो जाते हैं। हर राजनीतिक दल अपनी अपनी आवश्यकता और सुविधानुसार इन्हें चुनाव में प्रत्याशी बनाकर माननीय बनने का अवसर प्रदान करना है। जब यह जनता की अदालत से चयनित होकर माननीय हो जाते हैं तब कानून की अदालत का रूख भी इनके प्रति बदल जाता है क्योंकि बहुत अरसे से देश की शीर्ष अदालत ने यह निर्देश दे रखे हैं कि अधीनस्थ अदालत एक वर्ष के भीतर इनके मामलों के फैसले करे। इसके लिये दैनिक आधार पर इनके मामलों की सुनवायी की जाये। यह निर्देश करने पर अदालत को सराहना तो मिल गयी लेकिन इन निर्देशों पर अमल कितना हुआ है यह जानने का प्रयास शायद आज तक नही हो पाया है।
इस परिदृश्य में फिर यह सवाल उभरता है कि आम मतदाता इनका व्यक्तिगत और व्यवहारिक आकलन कैसे करे। क्योंकि केन्द्र से लेकर राज्य तक चुनावों में हर राजनीतिक दल अपना -अपना चुनाव घोषणापत्र जारी करता है। सरकार बनने के बाद इस घोषणापत्र को नीति पत्र बना दिया जाता है और इसके अनुसार सरकार काम करने लग जाती है। इस तरह फिर सांसद/विधायक की अपनी परफार्मेंन्स का आकलन नही हो पाता है। शायद इसी स्थिति को ध्यान में रखकर सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों से अलग हटकर सांसद/विधायक विकास नीतियों का प्रावधान किया गया है। क्योंकि इस निधि से सांसद/ विधायक अपनी ईच्छानुसार खर्च करता है। इस खर्च के लिये दिशा-निर्देश तय किये गये हैं लेकिन इन निर्देशों में यह नही है कि इस निधि में से खर्च करने के लिये किसी अन्य से कोई अनुमति लेनी होगी। इस नाते यह सांसद निधि स्वतः ही एक ऐसा मानक बन जाता है जिसके खर्च करने पर नजर रखने से यह पता चल जाता है कि इसमें ‘‘सबका साथ सबका विकास’’ के सिन्द्धात पर काम किया गया है या नही। किसके साथ पक्षपात हुआ है या सही में यह खर्च विकास पर हुआ है या नही। इस सबकी जानकारी इससे मिल जाती है।
इस मानक पर प्रदेश के सांसदो का आंकलन करना बहुत आसान हो जाता है। प्रदेश में लोकसभा की चार सीटे हैं और विधानसभा के लिये विधायकों की 68 सीटें हैं। इस तरह प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र में सत्रह-सत्रह विधानसभा क्षेत्र आते हैं प्रत्येक सांसद को प्रति वर्ष पांच करोड़ की सांसद विकास निधि मिलती है। इस समय वर्तमान में प्रदेश में कांगड़ा से शान्ता कुमार, हमीरपुर से अनुराग ठाकुर मण्डी से रामस्वरूप शर्मा और शिमला से वीरेन्द्र कश्यप सांसद हैं। इनमें से अनुराग ठाकुर और रामस्वरूप को भाजपा ने पुनः प्रत्याशी बनाया है। शान्ता और वीरेन्द्र कश्यप को इस बार बदल दिया गया है। वीरेन्द्र कश्यप दो बार लगातार सांसद रहे हैं। इस नाते उन्हें पचास करोड़ सांसद निधि के रूप में मिले हैं। अनुराग 2008 में उपचुनाव जीत कर सांसद बन गये थे और तब से लगातार सांसद हैं उन्हें 55 करोड़ की सांसद निधि मिली है जबकि शान्ता कुमार और रामस्वरूप को 25-25 करोड इस निधि में मिले हैं। एक सांसद के पास सत्राह विधानसभा क्षेत्र हैं इस नाते उसे 25 करोड़ का आवंटन इन सत्रह हल्कों पर एक समान करना है। इस तरह प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के हिस्से में 1,47,05,889 रूपये आते हैं। इस गणित से यह सामने आ जायेगा कि हमारे सांसदो ने विधानसभा क्षेत्रवार क्या इसी अनुपात में अपनी सांसद निधि का आंवटन किया है की नहीं। इसके लिये सांसदो की इस निधि के खर्च का ब्यौरा लेने के लिये आरटीआई का सहारा लिया गया था।
अनुराग से बिलासपुर को 11 वर्षो में मिले 11,46,96,351
हमीरपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व अनुराग ठाकुर 2008 से कर रहे हैं इसलिये उन्हें ग्याहर वर्षों में 55 करोड़ की सांसद निधि मिली है। हमीरपुर संसदीय क्षेत्रा से बिलासपुर के चार, हमीरपुर-ऊना के पांच-पांच कांगड़ा के दो और मण्डी का एक विधानसभा क्षेत्र आता है। अनुराग से पहले यहां से सुरेश चन्देल भाजपा से सांसद रह चुके हैं जो अब कांग्रेस में शामिल हो गये हैं। बिलासपुर से ही राज्यसभा सांसद जगत प्रकाश नड्डा मोदी सरकार में स्वास्थ्य मन्त्रा हैं। अनुराग के खिलाफ बिलासपुर के साथ भेदभाव बरतने का भी आरोप लगता है। सांसद निधि के आवंटन पर यदि नजर डाले तो अनुराग को पूरे कार्यकाल मे बिलासपुर को 11,46,96,351 मिले हैं बिलासपुर के चार विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से यहां पर कराब 12 करोड़ मिलने चाहिये थे लेकिन ऐसा हुआ नही है। इस तरह सांसद निधि के आवंटन के आंकड़े भी बिलासपुर के साथ भेदभाव के आरोपों को पुख्ता करते हैं।
Total Schemes Sanctioned Amount
2008-09 68 86,56,250
2009-10 51 63,92,000
2010-11 43 43,25,000
2011-12 91 98,78,240
2012-13 91 1,22,13,968
2013-14 138 1,46,58,000
2014-15 101 1,28,33,805
2015-16 83 94,00,000
2016-17 56 53,35,000
2017-18 123 1,20,01,305
2018-19 193 1,90,02,783
Total 1038 11,46,96,351
मण्डी के रामस्वरूप भी नहीं कर पाये हैं एक समान आवंटन
मण्डी संसदीय क्षेत्र से वर्तमान सांसद रामस्वरूप शर्मा को भाजपा ने फिर चुनाव में उतारा है। मण्डी के जिन पंडित सुखराम के कन्धों का सहारा लेकर भाजपा ने पहली बार सरकार का कार्यकाल पूरा करने का श्रेय लिया था। वह पंडित जी अब भाजपा छोड़ कांग्रेस में घर वापसी कर चुके हैं। मण्डी संसदीय क्षेत्रा में मण्डी के नौ, कुल्लु के चार, लाहौल-स्पिति, किन्नौर, भरमौर और रामपुर के विधानसभा क्षेत्र आते हैं। रामस्वरूप शर्मा को 25 करोड़ की सांसद निधि मिली है। इसमें से कुल्लु चार विधानसभा क्षेत्रों का हिस्सा करीब 5,88,23,532 रू. बनता है लेकिन आरटीआई की सूचना के अनुसार कुल्लु को करीब 3 करोड़ ही मिले हैं रामपुर, किन्नौर, भरमौर और लाहौल स्पिति में यह आवंटन अनुपातन और भी कम है। ऐसे में यह बड़ा सवाल बन गया है कि इन लगभग नजरअन्दाज हुए विधानसभा क्षेत्रों से रामस्वरूप को पुनः समर्थन कैसे और कितना मिल पायेगा।
Total Schemes Sanctioned Amount
7 0,36,000-00
23 0,51,000-00
23 0,44,000-00
23 0,57,000-00
23 0,37,50,000
Total 126 2,98,00,00-00
शान्ता कुमार ने कांगड़ा को दिये 26 करोड़
कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में जिला कांगड़ा की तेरह और चम्बा के चार विधानसभा क्षेत्र आते हैं। उन्हे 25 करोड़ की सांसद निधि मिली है। जिसमे से अकेले कांगड़ा में ही उन्होंने 26 करोड़ का आवंटन कर दिया है। इस खर्च का विवरण हर जिला के जिलाधीश से आता है। ऐसे में जब शान्ता कुंमार ने कांगड़ा के ही 13 विधानसभा क्षेत्रों में यह आंवटन कर दिया है तो स्वभाविक है कि चम्बा के हिस्से में कुछ नही आया है। शान्ता का यह आंवटन 2112 कार्य योजनाओं पर हुआ है लेकिन इनमे से केवल 1033 कार्य ही पूरे हो पाये हैं। इस तरह शान्ता कुमार भी सांसद निधि के एक समान वितरण के मानक पर खरे नही उतरते हैं। इसलिये यह आशंका हो गयी है कि शान्ता कुमार द्वारा की गयी चम्बा उपेक्षा चुनावी गणित न बिगाड दे क्योंकि कांगड़ा में फिर हर विधानसभा क्षेत्र के साथ एक बराबर आंवटन नही हुआ है।
Total Schemes Sanctioned Amount
2014-15 388 5,38,57,564,00
2015-16 549 5,94,04,782,00
2016-17 450 5,12,45,027,00
2017-18 437 5,58,94,051,00
2018-19 293 4,79,06,095,00
Total 2112 26,81,07,519,00
वीरेन्द्र कश्यप ने भी सांसद निधि के आवंटन में पक्षपात किया है
वीरेन्द्र कश्यप पिछले दस वर्षों से शिमला से सांसद हैं। भले ही भाजपा ने उन्हे कैश ऑन कैमरा के आरोपों के साये में इस बार प्रत्याशी नही बनाया है। लेकिन उनके दस वर्षो के कार्यकाल की कारगुजारी का असर पार्टी के इस बार के उम्मीदवार की सफलता की संभावनाओं पर पड़ेगा ही यह तय है। भाजना ने इस बार सिरमौर से वर्तमान विधायक सुरेश कश्यप को उम्मीदवार बनाया है। सिरमौर का हाटी समुदाय लम्बे अरसे से उन्हें जनजातीय दर्जा देने की मांग कर रहा है। वीरेन्द्र कश्यप अपने दस वर्ष के कार्यकाल में मोदी की सरकार होने के बावजूद यह मांग पूरी नही करवा पाये हैं। जबकि मोदी स्वयं हिमाचल से भाजपा के प्रभारी रह चुके हैं और इस नाते इस मांग से परिचित भी रहे हैं। अब कश्यप ने सिरमौर के पांच विधानसभा क्षेत्रों को केवल 6,88,55000 की सांसद निधि आंवटित की है जब कि यह राशी 15 करोड़ के करीब बनती है। कश्यप को दस वर्षों के कार्यकाल में पचास करोड़ की निधि मिली है। इस निधि का आंवटन अब सवालों के घेरे में आता जा रहा है।
Total Schemes Sanctioned Amount
2014-15 105 1,40,95,000
2015-16 72 94,70,000
2016-17 89 1,69,10,00
2017-18 56 1,14,50,000
2018-19 84 1,74,30,000
Total 406 6,88,55000
सांसद निधि के आंकड़ो से यह स्पष्ट है कि हमारे सांसद सारी निधि का उपयोग नही कर पाये हैं। इस निधि के तहत जो कार्य किये गये हैं उसमें से करीब 30ः कार्य ही अब तक पूरे हो पाये हैं। शेष कार्य कब पूरे होंगे इसको लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। क्योंकि इन सांसदो ने जो गांव आदर्श गावं बनाने के लिये गोद लिये थे उनकी दशा में भी विशेष सुधार देखने में नही आया है और इसके लिये धन का अभाव ही कारण रहा है। जबकि इन आदर्श गांव के लिये सांसद निधि से अलग धन का प्रावधान करने का दावा किया गया था जो कि पूरा हो नही पाया है। इस तरह सांसद निधि के आवंटन और आदर्श गांव के मानकों पर हमारे सांसदो का रिपोर्ट कार्ड ऐसा नही है जिससे सरकार और पार्टी को कोई बड़ा चुनावी लाभ मिलने की संभावना बनती हो।
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