शिमला/शैल। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और तीन बार हमीरपुर से सांसद रह चुके सुरेश चन्देल कांग्रेस में शामिल हो गये हैं। लम्बे अरसे से चन्देल के कांग्रेस में शामिल होने की अटकलें चल रही थी। बल्कि एक स्टेज पर तो उन्हे कांग्रेस द्वारा हमीरपुर से प्रत्याशी बनाये जाने की भी पूरी संभावना बन गयी थी। लेकिन तब मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर, पार्टी अध्यक्ष सत्तपाल सत्ती ने उनसे बैठक करके इस स्थिति को रोक लिया था। बल्कि उसी दौरान चन्देल की भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह से भी भेंट हुई और उनके भाजपा से बाहर जाने की सारी संभावनाओं पर विराम लग गया। कांग्रेस ने हमीरपुर से रामलाल ठाकुर को उम्मीदवार भी बना दिया। यह सब हो जाने के बाद चन्देल के कुछ
समर्थकों ने उनको आजाद उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का सुझाव दिया। इस सुझाव पर चन्देल का यह ब्यान आया कि वह शीघ्र ही फैसला लेंगे कि उनका अगला कदम क्या होगा। वह भाजपा में रहेंगे या कांग्रेस में या निर्दलीय होकर चुनाव लड़ेंगे। चन्देल के इस ब्यान के बाद मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर फिर उनसे बिलासपुर मिलने गये। चन्देल के अतिरिक्त जयराम भाजपा से नाराज चल रहे पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष रिखी राम कौंडल से मिले। लेकिन इस मुलाकात का क्या परिणाम रहा इस पर बहुत कुछ बाहर नही आया।
अब जब मुख्यमन्त्री की मुलाकात के बाद सुरेश चन्देल विधिवत कांग्रेस में शामिल हो गये हैं तो स्वभाविक है कि इस शामिल होने के राजनीतिक अर्थ एकदम बदल जाते हैं और महत्वपूर्ण भी हो जाते हैं। चन्देल तीन बार हमीरपुर से सांसद रह चुके हैं इस नाते उनका अपना एक जनाधार पूरे क्षेत्र में आज भी है। वह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे चुके हैं इस नाते पार्टी के बहुत सारे कार्यकर्ता और पदाधिकारी व्यक्तिगत रूप से भी लाभान्वित रहे होंगे इसलिये आज चन्देल के जाने से भाजपा को एक झटका लगा है इसे झुठलाया नही जा सकता। फिर आज कांग्रेस न तो प्रदेश में सत्ता में है और न ही केन्द्र मे इसलिये यह आरोप नही लग पायेगा कि चन्देल किसी निजि स्वार्थ के लिये कांग्रेस में शामिल हुए हैं। आज यही माना जायेगा कि वैचारिक मतभेद और व्यापक जनहित को सामने रखकर ही चन्देल ने भाजपा को अलविदा कहा है। फिर चन्देल तीन बार सांसद रह चुके हैं इस नाते उनके राष्ट्रीय स्तर पर कुछ शीर्ष लोगों से अच्छे रिश्ते आज भी होंगे और इन रिश्तो के कारण उनके पास उसी स्तर की सूचनाएं भी रही होंगी। बहुत संभव है कि इन सूचनाओं से प्रभावित होकर ही चन्देल ने यह फैैसला लिया हो क्योंकि अभी पिछले दिनों ही शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कई नेता भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए हैं। पूर्व मन्त्री यशवन्त सिन्हा और अरूण शोरी जैसे नेता राफेल मुद्दे पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं। आज 2014 के मुकाबले राजनीतिक हालात बदल चुके हैं तब कांग्रेस छोड़कर लोग भाजपा में जा रहे थे और आज भाजपा से भी लोग बाहर जाने लग पड़े हैं। वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवानी, डा. मुरली मनोहर जोशी और शान्ता कुमार जैसे नेता अपनी पीड़ा जग जाहिर कर चुके हैं। डा. मुरली मनोहर जोशी के नाम से तो एक पत्र भी सोशल मीडिया की चर्चा का विषय रह चुका है। फिर अभी कुछ विदेशी ऐजैन्सीयों CIA,KGB और MOSAD के नाम से भारत के चुनावों पर एक सर्वे बीबीसी के हवाले से आया है। इसमें दावा किया गया है कि एनडीए की अधिक से अधिक 158 और कम से कम 95 सीटें आयेंगी। यूपीए की अधिक से अधिक 327 और कम से कम 225 सीटें आने का आकलन किया गया है। स्वभाविक है कि इस तरह आंकलनों का अपनी ही तरह का एक प्रभाव रहता हैं बहुत लोग इस तरह के आकलनों से प्रभावित होते हैं बहुत संभव है कि सुरेश चन्देल के फैसले के पीछे भी इस तरह की सूचनाओं की एक मुख्य भूमिका रही हो।
यह तय है कि सुरेश चन्देल के जाने से भाजपा के सारे समीकरणों में बदलाव आयेगा और इसका असर प्रदेश की चारों सीटों पर पड़ेगा।
अब सी आई ए, के जी बी और मोसाद का सर्वे चर्चा में
"BJP will loose seats and Congress led UPA will win 2019 Lok Sabha polls says CIA, KGB & MOSAD Survey..."
"BJP led NDA-Worst possible Performance" = 95 Seats.
"BJP led NDA Best possible Performance" = 158 Seats
"Congress led UPA-worst possible performance" = 225 Seats.
"Congress led UPA-Best possible performance" = 327 Seats.
"Prime Minister Narendra Modi is loosing his popularity day by day in the country today. Main opposition party President Rahul Gandhi is emerging as most popular leader amongst people of India, especially after his pre poll announcement of a scheme which will ensure 250 million Indians would get 12000 Indian Rupees approximately equivalent to 150 British Pound per month."
https://www.bbc.co.uk/news
शिमला/शैल। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में भाजपा के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी के नाम से लाल कृष्ण आडवाणी को लिखा एक पत्र चर्चा मे आया है। यह पत्र ए..एन.आई के माध्यम से वायरल हुआ कहा जा रहा है क्योंकि पत्र के ऊपर एएनआई लिखा गया है। पत्र पर 12 अप्रैल की तारीख दर्ज है। इस पत्र के वायरल होने के दो तीन दिन बाद सोशल मीडिया में ही एएनआई और डाॅ. जोशी के नाम से कहा गया है कि यह पत्र फेक है। लेकिन इस पत्र को लेकर सोशल मीडिया के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज करवाई गयी हो ऐसा अभी तक सामने नही आया है न ही इस संबंध में डाॅ. जोशी की ओर से प्रिन्ट मीडिया या न्यूज चैनलज़ पर कोई खण्डन आया है। जबकि यह पत्र यदि सच में ही सही है तो यह एक बहुत गंभीर मुद्दा है।
इस पत्र की गंभीरता
आज के राजनीतिक वातावरण में और भी बढ़ जाती है। क्योंकि भाजपा के ही पूर्व मन्त्राी अरूण शोरी, यशवन्त सिन्हां एक अरसे से रफाल सौदे के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी रिव्यू याचिका स्वीकार कर ली है। भाजपा के ही पूर्व मन्त्री शत्रुघ्न सिन्हा एक अरसे से विपक्ष की सभाओं में शिरकत करते रहे हैं और अब कांग्रेस में शामिल हो गये हैं। लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और शान्ता कुमार जैसे वरिष्ठ नेताओं को आज भाजपा ने पुनः चुनाव में नही उतारा है। 2014 में जब भाजपा ने लोकसभा चुनावों के लिये घोषणा पत्र जारी किया था उसमें आडवाणी और जोशी की मुख्य भूमिका थी। इनके चित्र उस घोषणा पत्र पर दर्ज थे। लेकिन आज जब 2019 का घोषणापत्र जारी हुआ है उसमें आडवाणी और जोशी कहीं नही है। बल्कि घोषणा पत्र जारी करने के समारोह में शामिल नही थे। भाजपा की मुख्य धारा से जिस तरीके से इन लोगों को बाहर किया गया है उसका देश की जनता में कोई अच्छा संकेत और सन्देश नही गया है। आडवाणी ने इस सबको कैसे लिया है यह पार्टी के स्थापना दिवस पर आये उनके ब्लाॅग से देश के सामने आ गया है। आज पार्टी के अन्दर और बाहर चल रही मोदी शाह भक्ति पर अपरोक्ष में आडवाणी ने जो कुछ कहा है वह अपने मे सबके लिये आईना है।
हिमाचल के लोग जानते है कि शान्ता कुमार इस बार का लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। इसके लिये उन्होंने अपने तरीके से प्रचार अभियान भी छेड़ दिया था। लेकिन जब पार्टी ने उनको टिकट से बाहर कर दिया तब उनकी पीड़ा प्रदेश के सामने आ ही गयी। बल्कि अब तब सोनिया गांधी ने मोदी को वाजपेयी काल के 2004 के शाईनिंग इण्डिया की याद दिलाई तब शान्ता ने जिस ढंग से सोनिया की राय का समर्थन किया है उसके बाद शान्ता जैसे बड़े नेता को और कोई संकेत/संदेश देना शेष नही रह जाता है। क्योंकि राफेल सौदे के बाद फ्रांस सरकार ने जिस तरह से अंबानी को 1155 करोड़ की टैक्स राहत दी है उससे बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है। यही नही आज आरटीआई के तहत आरबीआई से मिली जानकारी में यह सामने आ गया है कि 2014 से 2018 तक मोदी सरकार के कार्यकाल मे 5,55,603 के ऋण राईट आफ कर दिये गये हैं। यह ऋण किन बड़े लोगों के रहे होंगे इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है।
ऐसे में जिस पार्टी और सरकार के सामने ऐसे गंभीर सवाल जवाब मांगते खड़े होंगे उसकी अन्दर की हालत का अनुमान लगाया जा सकता है फिर इस तरह के परिदृश्य में जब पार्टी के वरिष्ठ लोगों के साथ ऐसा व्यवहार होगा तो उनकी पीड़ा कहीं तो छलक कर बाहर आ ही जायेगी। फिर जब पार्टी का घोषणापत्र जारी करने के मौके पर यह वरिष्ठ नेता समारोह में शामिल नही थे तब इनको लेकर मीडिया में सवाल उठने स्वभाविक थे और यह उठे भी। संभवतः इन्ही सवालों के बाद अमितशाह, आडवाणी और जोशी से मिलने गये थे। इस पृष्ठभूमि में बहुत संभव है कि डाॅ. जोशी की पीड़ा भी इस पत्र के रूप में छलक गयी हो। आज सोशल मीडिया पार्टीयों का बहुत बड़ा साधन बना हुआ है। बल्कि प्रिन्ट मीडिया की बजाये राजनीतिक दल सोशल मीडिया का ज्यादा सहारा ले रहे हैं। हजारों की संख्या में कार्यकर्ताओं को सोशल मीडिया में काम दिया हुआ है। यह सोशल मीडिया के सक्रिय कार्यकर्ता किस तरह की सूचनाएं आम लोगों तक इस माध्यम से पहुंचा रहे हैं। क्या कोई नेता या कार्यकर्ता इन सूचनाओं की जिम्मेदारी ले रहा है शायद नही। फिर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी तो डिजिटल इण्डिया के बहुत बड़े पक्षधर हैं उन्होने तो इसे विशेष प्रोत्साहन दिया है। वह इसे अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि करार देते हैं। लेकिन क्या इस डिजिटल इण्डिया और सोशल मीडिया की कोई विश्वसनीयता बन पायी है। आज इसमें किसी का भी अकाऊंट हैक किया जा सकता है। बहुत संभव है कि डाॅ. जोशी का यह पत्र उसी हैकिंग का परिणाम हो। लेकिन इसमें यह सवाल जो जवाब मांगेगा ही कि जो न्यूज चैनल भाजपा नेताओं से ज्यादा भाजपा का प्रचार-प्रसार कर रहे थे वहां पर इस पत्र के फेक होने के समाचार क्यों नही आये। डाॅ. जोशी ने किसी अखबार या न्यूज चैनल से बात करके इसका खण्डन क्यों नही किया? भाजपा/जोशी की ओर से इसमें अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नही करवाई गयी है। इस परिदृश्य में यह आवश्यक हो जाता है कि पाठक इस पत्र को पढ़कर स्वयं अपनी राय बनायें। डाॅ.जोशी का कथित पत्र

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिये वर्ष के पहले ही सप्ताह में 700 करोड़ का ऋण लेने जा रही है। सरकार को वर्ष के शुरू में ही कर्ज लेने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है यह सवाल राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में चर्चा का विषय बना हुआ है। क्योंकि इसी बीच में अदानी पावर लिमिटेड की एक याचिका प्रदेश उच्च न्यायालय ने के सामने आयी है। CWP No. 405 of 2019 पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने सरकार से यह पूछा है कि सरकार बताये की जंगी थोपन पवारी परियोजना को सरकार कैसे आवंटित कर रही है ताकि इस आवंटन के बाद अदानी का 280 करोड़ रूपया वापिस लौटाया जा सके जिसका पहले से ही वायदा कर रखा है। अदानी प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मादी का बहुत ही विश्वस्त उद्योग घराना है यह सब जानते हैं। इसलिये अदानी को 280 करोड़ वापिस न करने का स्टैण्ड जब वीरभद्र सरकार ही नही ले पायी थी तो जयराम सरकार ऐसा कैसे कर सकती है यह एक सामान्य समझ की बात है। बल्कि वीरभद्र शासन में ही इसके लिये पूरी ज़मीन तैयार कर दी गयी थी कि अदानी को यह पैसा उच्च न्यायालय के माध्मय से वापिस लेना आसान हो जाये। आज उसी पृष्ठभूमि का सहारा लेकर अदानी उच्च न्यायालय पहुंच गया है। माना जा रहा है कि यह पैसा वापिस करने के लिये ही कर्ज का जुगाड़ किया जा रहा है।
इस परिदृश्य में जंगी थोपन पवारी परियोजना के प्रकरण पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है। स्मरणीय है कि हिमाचल सरकार ने वर्ष 2006 में छः हजार करोड़ के निवेश वाली जंगी-थोपन-पवारी हाईडल परियोजना के लिये निविदायें आमन्त्रित की थी। निविदायें आने के बाद यह परियोजना हालैण्ड की कंपनी ब्रेकल कारपोरेशन को आंवटित कर दी गयी। आंवटन के बाद नियमों के अनुसार कंपनी को 280 करोड़ का अपफ्रन्ट प्रिमियम सरकार में जमा करवाना था। लेकिन यह कंपनी यह पैसा समय पर जमा नहीं करवा पायी और सरकार से किसी न किसी बहाने समय मांगती रही। जब ब्रेकल यह प्रिमियम अदा नहीं कर पायी तब इसी आंवटन की प्रक्रिया में दूसरे स्थान पर रही रिलांयस इन्फ्रास्ट्रक्चर ने इस मामलें को प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। यह चुनौती दिये जाने के बाद सरकार में भी ब्रेकल के दस्तावेजों की जांच पड़ताल शुरू हो गयी और अपराधिक मामला दर्ज करने की नौबत आ गयी। ब्रेकल को सरकार ने यह आवंटन रद्द करने का नोटिस दे दिया। नोटिस मिलने के बाद ब्रेकल ने अदानी से 280 करोड़ लेकर सरकार में प्रिमियम जमा करवा दिया और सरकार ने इसे ले भी लिया। इससे रिलांयस की याचिका निरस्त हो गयी। सरकार ब्रेकल को नोटिस दे चुकी थी विजिलैन्स ने आपराधिक मामला दर्ज किये जाने की संस्तुती सरकार को भेज रखी थी। इस पर सरकार ने पूरा मामला सचिव कमेटी को फिर से जांच के लिये भेज दिया। सचिव कमेटी ने ब्रेकल को तलब किया और ब्रेकल के साथ ही अदानी के अधिकारी भी कमेटी में पेश हो गये जबकि उनके आने का कोई कानूनीे आधार नही था। लेकिन सचिव कमेटी ने उनकीे उपस्थिति पर कोई एतराज नही जताया और यह परियोजना फिर ब्रेकल को ही देने का फैसला कर दिया।
रिलांयस ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौतीे दे दी। रिलांयस के साथ ही ब्रेकल भी अपना पक्ष लेकर सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया। इन्ही के साथ ही अदानी ने भी सर्वोच्च न्यायालय में यह पक्ष रख दिया कि 280 करोड़ निवेश उसने किया है इस पर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी हो गया। इस नोटिस पर सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में अपना जवाब दायर करते हुए अदालत के सामने यह रखा कि इस परियोजना में हुई देरी से सरकार को 2775 करोड़ का नुकसान हुआ है। इसकेे लिये ब्रेकल को इस नुकसान की भरपायी करने तथा अपफ्रन्ट प्रिमियम के नाम पर आये उसके 280 करोड़ जब्त करने का नोटिस जारी कर दिया गया है। सरकार का यह स्टैण्ड अदालत में आने के बाद ब्रेकल ने अपनी याचिका वापिस ले ली। ब्रेकल के याचिका वापिस लेने के साथ ही अदानी की याचिका भी निरस्त हो गयी। लेकिन यह होने के बावजूद आज तक सरकार ने 2775 करोड़ वसूलने के लिये कोई कदम नही उठाये हैं यहां तक कि प्रिमियम के आये 280 करोड़ भी अब तक जब्त नही किये गये हंै।
बल्कि इसमें सबसे दिलचस्प तो यह घटा कि ब्रेकल और अदानी के सर्वोच्च न्यायालय से बाहर आते ही रिलांयस और सरकार में कुछ घटा तथा यह परियोजना फिर से रिलांयस को देने का फैसला कर दिया गया। रिलांयस को इस आश्य का पत्र भी चला गया। रिलांयस ने इस पत्र को स्वीकार करवाने में सहयोग करने का आग्रह कर दिया। रिलांयस को यह सब हासिल करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय से अपनी याचिका वापिस लेनी थी। इसका सरकार के साथ मिलकर सयंुक्त आग्रह अदालत में जाना था। इसके लिये सरकार पहले तैयार हो गयी लेकिन बाद में मुकर गयी। दूसरी ओर जब अदानी सर्वोच्च न्यायालय से बाहर आया तो उसने अपने 280 करोड़ वापिस किये जाने के लिये सरकार को पत्र लिखा। इस पत्र का असर यह हुआ कि जब रिलायंस को यह प्रौजेक्ट देने का फैसला लिया गया तब यह मान लिया गया कि रिलांयस से प्रिमियम आने के बाद अदानी के 280 करोड़ वापिस कर दिये जायेंगे। अब रिलांयस भी पीछे हटने के बाद अतिरिक्त मुख्य सचिव पावर ने निदेशक एनर्जी को पत्र लिखकर यह राय मांगी है कि क्या इस परियोजना को फिर से ब्रेकल को दिया जा सकता है या इसकी फिर से बोली लगायी जाये या राज्य सरकार/केन्द्र सरकार के किसी उपक्रम को दे दिया जाये। अब यह परियोजना एसजेवीएनएल को दे दी गयी है।
एसजेवीएनएल एक सरकारी उपक्रम है और उसमें अपफ्रंट प्रिमियम देने का कोई प्रावधान ही नहीं है। ऐसे में इस उपक्रम से अपफ्रन्ट प्रीमियम लेकर अदानी को यह पैसा वापिस करना संभव नही है लेकिन वीरभद्र सरकार में यह पैसा वापिस करने का फैसला मन्त्रीमण्डल ने 2015 में ही ले लिया था। इसी बैठक में यह परियोजना रिलाॅंयंस को देने का भी फैसला लिया गया था और यह कहा गया था कि रिलांयस से पैसा आने पर अदानी को वापिस दे दिया जायेगा। लेकिन रिलांयस ने 2016 में यह परियोजना लेने से ही इन्कार कर दिया। परन्तु इसके बावजूद वीरभद्र सरकार ने 26 अक्तूबर 2017 को अदानी पावर का पत्र लिखकर यह सूचित कर दिया कि 4 सितम्बर 2015 को अपफ्रन्ट प्रिमियम मनी लौटाने का जो फैसला लिया गया था उसे लागू करने का फैसला लिया गया है। सरकार की ओर से यह सूचना अदानी को तत्कालीन विशेष सचिव ऊर्जा अजय शर्मा की ओर से दी गयी थी। अदानी ने 27 अक्तूबर 2017 का सरकार का पत्र लिखकर इस फैसल के लिये आभार जताया था। इसमें अदानी ने यह भी कहा था कि इस वापसी को रिलांयस के साथ लिंक करने का कोई औचित्य नही बनता है। इस तरह सरकार ने जब यह मान लिया कि अदानी को यह पैसा वापिस दिया जाना बनता है तो उसी को आधार बनाकर अब अदानी ने उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है। इसमें 26 अप्रैल को अगली सुनवायी होनी है। माना जा रहा है कि सरकार अगली पेशी से पहले यह पैसा देने का प्रबन्ध कर रही है। जयराम इस विषय पर मूक दर्शक बने हुए हैं क्योंकि जिन अधिकारियों ने वीरभद्र सरकार में यह फैसला लेने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी वही लोग आज भी इसकी पेरवी कर रहे हैं। इन लोगों के लिये इससे कोई फर्क नही पड़ता है कि इस मामले में अब तक प्रदेश को करीब तीन हजार करोड़ का नुकसान पहुंच चुका है।

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