शिमला/शैल। जगत प्रकाश नड्डा अन्नतः भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष बन गये हैं और वर्ष के अन्त में होने वाले कुछ विधानसभाओं के चुनावों के बाद वह पूर्णकालिक अध्यक्ष बन जायेंगे क्योंकि अमित शाह ने इन्हीं चुनावों तक यह जिम्मेदारी संभाले रखने की बात की है। नड्डा का नाम जब नये मन्त्रियों की सूची में नहीं आया था तभी यह चर्चा सामने आ गयी थी कि वह अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। वैसे नड्डा के अध्यक्ष बनने की चर्चा प्रदेश में बहुत अरसे से चलती आ रही है। नड्डा का
अध्यक्ष बनना हिमाचल के लिये गौरव की बात है क्योंकि यहां से लोकसभा की चार ही सीटें होने से इसे छोटे प्रदेशों में गिना जाता है इस नाते भी यह बड़ी उपलब्धि है। लेकिन अध्यक्ष का कार्यकाल एक नीयत समय तक ही होता है और भाजपा में इस पद पर दो टर्म से अधिक तक नहीं रह सकते हैं यह संगठन का नियम और प्रथा है। लेकिन नड्डा अभी युवा हैं तो दो टर्म के बाद ही उनके रिटायर हो जाने की बात नहीं होगी। ऐसे में विश्लेष्कों के सामने यह सवाल उठना स्वभाविक है कि अध्यक्ष की टर्म खत्म होने के बाद केन्द्र की राजनीति में ही रहना पसन्द करेंगे या प्रदेश में वापिस आयेंगे।
इस समय केन्द्र में हिमाचल से युवा सांसद अनुराग ठाकुर वित्त राज्य मन्त्री हैं और वित्त मन्त्रालय में एक ही राज्य मन्त्री है। राज्य मन्त्री के रूप में वित्त विभाग में ऐसे बहुत सारे काम होतें हैं जो उसी स्तर पर निपटा दिये जाते हैं। इस तरह वित्त राज्य मन्त्री के रूप में अनुराग का राजनीतिक कद भी बड़ा हो जाता है और इसी नाते यह भी प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा शक्ति केन्द्र हो जाते हैं। फिर वह नड्डा और जयराम के मुकाबले ज्यादा युवा हैं। क्रिकेट के माध्यम से जो काम उन्होंने प्रदेश में कर रखे हैं उससे उनकी अपनी एक अलग पहचान भी बन गयी है। प्रदेश के युवा वर्ग में उनका अपना एक अलग स्थान बन चुका है इसमें कोई दो राय नहीं है।
नड्डा और अनुराग के साथ ही प्रदेश का तीसरा बड़ा शक्ति केन्द्र मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर हैं। लेकिन जयराम मुख्यमन्त्री होने से शक्ति केन्द्र बने हैं। यदि वह मुख्यमन्त्री न होते तो स्वभाविक है कि वह शक्ति केन्द्र न हो पाते क्योंकि वह चुनाव में पार्टी के सी एम फेस नहीं थे। लेकिन आज एक वर्ष से अधिक का कार्यकाल पूरा कर लेने और लोकसभा की चारों सीटों पर शानदार जीत हासिल करने के बाद अब वह स्थापित हो गये हैं। अब उनकी अगली राजनीतिक परीक्षा 2022 के लोकसभा चुनाव ही होंगे। 2022 तक उन्हें किसी भी तरह की राजनीतिक अस्थिरता का कोई खतरा नहीं है बशर्ते कि राजनीति के यह दूसरे शक्ति केन्द्र उन्हें सहयोग करते रहें। क्योंकि धूमल के कार्यकाल में यह घट चुका है जब पार्टी के कुछ विधायकों ने ही विधानसभा सत्र बहिष्कार करने का रूख अपना लिया था। धूमल के ही कार्यकाल में यह भी घटा है जब अपनी ही सरकार के खिलाफ अपने ही मन्त्रियों/ विधायकों और अन्य नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को ज्ञापन सौंप दिया था। यह कुछ ऐसे घटनाक्रम रहे हैं जिनसे यह पता चलता है कि राजनीति में कभी भी कुछ भी घट सकता है। फिर विधानसभा के पिछले दो सत्रों में ही भाजपा के कुछ विधायक सरकार के प्रति जिस कदर आक्रामक हो चुके हैं उससे इसी सबकी पुष्टि होती है। क्योंकि जब सत्ता शक्ति के एक से अधिक केन्द्र बन जाते हैं तो स्थितियां नाजुक हो ही जाती हैं।
इस समय प्रदेश में मन्त्रीयों के दो पद खाली हैं जो कि भरे जाने हैं। इसी के साथ विधानसभा के दो उपचुनाव भी होने हैं। मुख्यमन्त्री ने पिछले दिनों यह संकेत दिये हैं कि वह इन मन्त्री पदों को उपचुनावों के बाद भरेंगे। जबकि पहले यह कहा था कि लोकसभा चुनावों की परफारमैन्स के आधार पर मन्त्री बनाये जायेंगे। बल्कि मन्त्रीयों के विभागों में फेरबदल तक करने के संकेत दे दिये थे। लेकिन आज सभी विधायकों की चुनावों में सफलता आशा से अधिक रही है। ऐसे में अब मन्त्रीयों का चयन बहुत आयान नही रह गया है। यह सही है कि सिद्धान्त रूप में मन्त्री बनाना मुख्यमन्त्री का ही एकाधिकार होता है लेकिन व्यवहारिकता में ऐसा नही हो पाता है। इसलिये यह तय है कि इस बार मन्त्री बनाने में नड्डा और अनुराग का भी दखल रहेगा। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि मन्त्री पद उपचुनावों के बाद भरे जाते हैं या अभी। इसी के साथ यह देखना भी रोचक होगा कि विधानसभा के उपचुनावों में भी जीत के आंकड़ों का अनुपात लोकसभा की जीत के बराबर रह पाता है या नही। क्योंकि जीत का अनुपात यह प्रमाणित करेगा कि लोगों ने प्रदेश सरकार के काम पर कितना समर्थन दिया है और मोदी को व्यक्तिगत तौर पर कितना।
यहां पर यह भी उल्लेखनीय रहेगा कि विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद भी विधायकों का एक बड़ा वर्ग धूमल को ही मुख्यमन्त्री देखना चाह रहा था और इसके लिये दो लोगों ने त्याग पत्र देकर सीट खाली करने की आफर भी दे दी थी। उसी समय यह भी सामने आया था कि नड्डा का नाम मुख्यमन्त्री के लिये फाईनल हो गया है। यह सामने आया था कि नड्डा का नाम मुख्यमन्त्री के लिये फाईनल हो गया है। यह सामने आते ही नड्डा के लोगों ने लड्डू बांटते हुए शिमला का रूख कर लिया था और फिर वह आधे रास्ते से वापिस हुए थे। उस समय नड्डा के पिछड़ जाने के बाद संगठन के चुनावों में भी बिलासपुर में नड्डा के समर्थकों को पूरी सफलता नही मिली थी। उस दौरान राकेश पठानिया जैसे विधायकों ने जिस हिम्मत और स्पष्टता के साथ नड्डा के साथ खड़े होने का साहस दिखाया था स्वभाविक है कि नड्डा उन्हें मन्त्री बनाने के लिये पूरा दम दिखायेंगे। इसी तरह नरेन्द्र बरागटा आज भी पहले धूमल के समर्थक माने जाते हैं बाद में जयराम के। फिर उनके मन्त्री के समकक्ष मुख्य सचेतक होने को उच्च नयायालय में चुनौती मिल चुकी है और इसमें नोटिस तक हो गये हैं। ऐसे में बरागटा को मंत्री पद दिलाने के लिये धूमल-अनुराग भी प्रयास करेंगे ही। विधानसभा अध्यक्ष डा. बिन्दल का नाम तो कई दिनों से चर्चा में है। इस परिदृश्य मे यह रोचक होगा कि मन्त्री पद मुख्यमन्त्री के अनुसार उपचुनावों के बाद भरे जाते हैं या पहले ही और उसमें किस को यह झण्डी मिलती है। इसी से प्रदेश की राजनीति में नये समीकरणों की की शुरूआत होगी यह तय है।
शिमला/शैल। राज्यसभा सांसद और पूर्व केन्द्रिय मन्त्री आनन्द शर्मा न केवल प्रदेश के ही बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। राज्यसभा में वह पार्टी के उपनेता भी हैं। हिमाचल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर उनके विशेष विश्वस्त माने जाते हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि राठौर को बनवाने में उनका ही सबसे बड़ा हाथ रहा है। अपनी वरिष्ठता के नाते ही वह लोकसभा चुनावों में वह प्रदेश में पार्टी के स्टार प्रचारक थे। स्टार प्रचारक के साथ-साथ मीडिया को लेकर भी उनके पास बड़ी जिम्मेदारी थी। लेकिन यह सब होते हुए भी वह पार्टी को प्रदेश में कोई सफलता नही दिला पाये हैं। अब जब पार्टी को हार का समाना करना पड़ा है तब प्रदेश के सारे वरिष्ठ नेताओं की अब तक की प्रदेश के प्रति कारगुजारी और कार्यशैली पार्टी के कार्यकर्ताओं में चर्चा का विषय बनी हुई है। स्मरणीय है कि आनन्द शर्मा केन्द्र में वरिष्ठ मन्त्री रहे हैं लेकिन इस मन्त्री होने से प्रदेश को एक स्थायी पासपोर्ट कार्यालय के अतिरिक्त वह और कुछ बड़ा प्रदेश को नही दे पाये हैं।
राज्यसभा सांसद के नाते सांसद निधि के संद्धर्भ में पूरा प्रदेश उनका अधिकार क्षेत्र हो जाता है। वह प्रदेश के किसी भी कोने में सांसद निधि से पैसा दे सकते हैं। सांसद निधि किस तरह के कार्यों पर खर्च की जा सकती है इसके लिये वाकायदा नियम बने हुए हैं। किसी प्राकृतिक आपदा में राज्य सभा सांसद प्रदेश से बाहर भी पैसा दे सकता है लेकिन सामान्य स्थितियों में नही। आनन्द शर्मा ने 2017 में अपनी सांसद निधि में से नवीं मुबंई के एक न्यरोजन ब्रेन एण्ड स्पाईन इन्स्टिच्यूट को 23,56,653 रूपये दिये हैं। जबकि इसी दौरान जिला शिमला में 30 कार्यों के लिये 38,70,000/- रूपये आबंटित किये हैं लेकिन इस आंबटन में से मार्च 2019 तक 11,90,000/- रूपये राशी अभी भी जारी नही हुई है। स्वभाविक है कि जब प्रदेश के कार्यों के लिये अब तक पूरी राशी जारी न हो सकी हो तो यह चर्चा का विषय बनेगी ही क्योंकि मुबंई के इस संस्थान के लिये सारी राशी एकमुश्त जारी हो गयी है। इसी के साथ यह भी चर्चा है कि शायद मुबंई का यह संस्थान सरकार का न होकर रिलायंस का है। जबकि नियमों के मुताबिक किसी प्राईवेट संस्थान को इस निधि से आबंटन नही किया जा सकता। फिर इस प्राईवेट संस्थान ने इस पैसे से लिफ्ट का निर्माण किया है। यह पैसा जिलाधीश शिमला के कार्यालय के माध्यम से गया है ऐसे में यह जिलाधीश की भी जिम्मेदारी हो जाती है कि वह पैसा रिलीज करने से पहले यह सुनिश्चित करे की संस्थान सरकारी है या प्राईवेट। जिलाधीश शिमला के कार्यालय में इसको लेकर कोई जानकरी ही उपलब्ध नही है। स्वभाविक है कि जब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की कारगुजारी इस तरह की रहेगी तो उसका जनता और कार्यकर्ताओं पर प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ेगा।

शिमला/शैल। अदाणी पावर ने 280 करोड़ वापिस लेने के लिये प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर रखी है। इस याचिका पर अब तक हुई सुनवाई में सरकार के महाधिवक्ता ने उच्च न्यायालय से यह कहकर टाईम लिया था कि सरकार इस मामले पर फैसला लेने के लिये इसे मन्त्री परिषद की बैठक में ले जायेगी। लेकिन चुनावी आचार संहिता लागू होने के चलते अभी ऐसा नही कर पायी है। इस पर उच्च न्यायालय ने सरकार को समय देते हुए 19 जून को इसकी सुवनाई रखी है। मुख्यमन्त्री अपने विदेश दौरे से 17 को वापिस आयेंगे। ऐसे में क्या 18 जून को मन्त्री परिषद की बैठक हो पाती है या इसमें एक बार फिर अदालत से और समय दिये जाने की गुहार लगायी जाती है यह अभी साफ नही है। इस मामले को मन्त्री परिषद में ले जाया जायेगा अदालत में यह ब्यान 26 अप्रैल को महाधिवक्ता का है। लेकिन महाधिवक्ता के इस ब्यान का संज्ञान लेते हुए प्रधान सचिव पावर प्रबोध सक्सेना ने 27 अप्रैल को ही फाईल पर यह सवाल उठा दिया था कि महाधिवक्ता को अदालत में ऐसा आश्वासन देने के जब उन्होंने निर्देश नही दिये थे तब ऐसा किसके निर्देश पर हुआ और इसी के साथ फाईल मुख्यमन्त्री को भेज दी थी। लेकिन सूत्रों के मुताबिक यह फाईल अभी तक मुख्यमन्त्री के कार्यालय से वापिस प्रधान सचिव सक्सेना के यहां नही पहुंची है।
स्मरणीय है कि अदाणी पावर जो 280 करोड़ सरकार से वापिस मांग रहा है उस पर कानूनन उसका कोई हक नही है क्योंकि जिस जंगी थोपन पवारी परियोजना के अपफ्रन्ट प्रिमियम के तौर पर अदाणी ने यह पैसा जमा करवाया था उसमें अधिकारिक तौर पर अदाणी का कोई लेना देना ही नही है। क्योंकि यह परियोजना नीदरलैण्ड की कंपनी ब्रकेल कारपोरेशन एनबी को आवंटित हुई थी। इसकी निविदाओं में अदाणी शामिल ही नही था और न ही ब्रेकल का कोई हिस्सेदार था। निविदाओं में रिलांयस दूसरे स्थान पर था। जब ब्रेकल इसमें समय पर 260 करोड़ का अपफ्रन्ट प्रिमियम जमा नही करवा पाया था। तब इस पर रिलांयस ने एतराज उठाया और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा दिया। सर्वोच्च न्यायालय में भी सरकार ने अपना पक्ष रखते हुय कहा है कि उसने ब्रेकल को इसमें हुए 2700 करोड़ के नुकसान की भरपाई करने तक का नोटिस दे रखा है। सरकार के इस स्टैण्ड के बाद सरकार, ब्रेकल और रिलायंस के बीच कुछ पका तथा मामला वापिस ले लिया गया। अदाणी ने ब्रेकल की ओर से 280 करोड़ जमा करवा दिये क्योंकि ब्रेकल को 20 करोड़ का जुर्माना भी लग गया था।
जब रिलायंस ने ब्रेकल द्वारा अपफ्रन्ट प्रिमियम जमा न करवाने पर एतराज उठाया और अपना हक जताया तब सरकार ने ब्रेकल के दस्तावेजों की जांच की। इस जांच में ब्रेकल पर गलत ब्यानी करने का आरोप लगा और उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करवाने की संस्तुति की गयी। लेकिन यह मामला आज तक दर्ज नही हुआ। लेकिन इसी दौरान जब 2014 में केन्द्र में सरकार बदल गयी और वीरभद्र के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला गंभीर हो गया तब ब्रेकल प्रकरण पर सरकार की राय बदल गयी। तब 2015 में वीरभद्र सरकार ने अदाणी को यह 280 करोड़ देने का फैसला ले लिया। उस दौरान वीरभद्र के एक अतिविश्वस्त नौकरशाह और अदाणी के लोगों के बीच काफी वार्ताएं होने की चर्चा भी उठी थी। यहां तक कहा गया था कि सरकार अदाणी के यह 280 करोड़ वापिस देगी और बदले में अदाणी वीरभद्र की मद्द करेंगे क्योंकि वह प्रधानमन्त्री मोदी के विश्वस्त हैं। इन चर्चाओं का परिणाम तब सामने भी आ गया जब 26 अक्तूबर 2017 को वीरभद्र सरकार के तत्कालीन विशेष सचिव पावर और अतिरिक्ति मुख्य सचिव पावर के बीच चर्चा होने के बाद सरकार की ओर अदाणी को पत्र भेजकर सूचित कर दिया कि सरकार ने उसके 280 करोड़ वापिस करने का फैसला ले लिया है। सरकार का यह फैसला तब मीडिया की चर्चा का विषय भी बना था तब इस चर्चा के बाद फिर फैसला बदल दिया गया और 7 दिसम्बर 2017 को नये विशेष सचिव पावर के यहां से अदाणी को पत्र चला गया कि सरकार ने 2015 का फैसला रद्द कर दिया है और अक्तूबर में लिखा पत्रा वापिस समझा जाये।
अब सरकार बदलने के एक वर्ष बाद अदाणी फिर उच्च न्यायालय पहुंच गये हैं और 18% ब्याज सहित 28 करोड़ वापिस दिये जाने की मांग की याचिका दायर कर दी है। लेकिन जयराम सरकार ने दिसम्बर 2017 के फैसले के आधार पर इस याचिका को डिसमिस करने का आग्रह करने की बजाये इस मामले को मन्त्री परिषद में ले जाने का आश्वासन दे रखा है। कायदे से तो इस सरकार को इसमें आपराधिक मामला दर्ज करके जांच करवानी चाहिये थी। क्योंकि प्रदेश को हजारों करोड़ का नुकसान हो चुका है और सरकार ने स्वयं इस नुकसान का आाकलन किया है। लेकिन अब इस सरकार की नीयत भी सन्देह के घेरे में आ गयी है। इसमें सबसे रोचक तो यह हो गया है कि प्रधान सचिव पावर सक्सेना ने महाधिवक्ता के ब्यान पर सवालिया निशान लगाते हुए फाईल मुख्यमन्त्री को भेज दी जहां से यह अब तक वापिस नही आयी है और आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं फाईल गुम तो नही हो गयी है।
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