शिमला/शैल। कांग्रेस ने चुनावों से पूर्व प्रदेश की जनता को जो दस गारंटीयां दी है उनमें से एक गारंटी 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने की भी है। यह गारंटीयां इसलिए दी गयी थी ताकि हर आदमी के जीवन स्तर की में गुणात्मक सुधार लाया जा सके। हर आदमी की क्रय शक्ति बढ़े। इन गारंटीयों के परिणाम स्वरूप प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया और कांग्रेस की सरकार बन गयी। सरकार बनने के बाद वायदे के मुताबिक प्रदेश के कर्मचारियों को ओल्ड पैन्शन योजना का लाभ मंत्रिमंडल की पहली ही बैठक में दे दिया गया। इसके बाद 18 से 60 वर्ष की महिलाओं को जो पंद्रह सौ रूपये प्रति माह देने की गारंटी थी उसमें करीब 11 लाख महिलाएं चिन्हित हुई हैं और उन्हें चरणबद्ध तरीके से यह लाभ देने की बात कही जा रही है अर्थात कुछ महिलाओं को इसी वर्ष से यह लाभ मिलना शुरू हो जायेगा। लेकिन तीन सौ यूनिट बिजली मुफ्त देने के मामले में अब यह कहा गया है की सरकार 3 वर्षों में 2000 मेगावाट बिजली का उत्पादन बढ़ायेगी और फिर 300 यूनिट बिजली मुफ्त बिजली उपभोक्ताओं को देगी। सरकार यह लाभ तुरन्त प्रभाव से इसलिए नहीं दे पा रही है क्योंकि उसे विरासत में एक अच्छी आर्थिक स्थिति नहीं मिली है। सरकार ने आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए कुछ उपाय किये हैं जिनमें एक शराब के ठेकों की नीलामी की प्रक्रिया में बदलाव करना था। इस बदलाव के परिणाम सकारात्मक रहे हैं और इससे अच्छा लाभ भी मिला है।
इसी तर्ज पर एक उपाय जल विद्युत परियोजनाओं पर जल उपकर लगाकर की चार हजार करोड़ की आय होने का अनुमान लगाया गया था। लेकिन इस उपकर पर जिस तरह से पंजाब और हरियाणा सरकारों ने एक ही दिन अपनी अपनी विधानसभाओं में प्रस्ताव पारित कर एतराज जताया है उसे स्पष्ट हो जाता है कि यह उपकर मामला एक बार अदालत में जरूर पहुंचेगा और इसके परिणाम आने में समय लगेगा। उपकर के अतिरिक्त 2000 मेगावाट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। स्मरणीय है कि हिमाचल में जितनी जल विद्युत दोहन चिन्हित की गयी थी उसके आधार पर हिमाचल को उर्जा राज्य प्रचारित किया गया। इसी प्रचार पर प्रदेश में उद्योगों की आमंत्रित किया गया। 24500 मेगावाट की कुल क्षमता में से 11149 मेगावाट का दोहन किया जा चुका है। इससे प्रदेश को कर और गैर कर से इस वर्ष 2249.77 करोड़ की आय होने का अनुमान है। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार 680 करोड़ की आय अधिक होने का अनुमान है और यह माना जा रहा है कि इस आय का बड़ा हिस्सा बिजली की दरें बढ़ने से होगा।
प्रदेश में बिजली का उत्पादन केंद्रीय क्षेत्र संयुक्त और निजी क्षेत्र में हो रहा है। संयुक्त और केंद्रीय क्षेत्र से 12% तक मुफ्त बिजली ली जा रही है। कुल उत्पादन का करीब 46% दोहन इस क्षेत्र के पास है। निजी क्षेत्र से 30% तक मुफ्त बिजली ली जा रही है। राज्य क्षेत्र से 3800 मेगावाट की विभिन्न योजनाएं कार्यशील हैं और इनमें 12% मुफ्त बिजली का प्रावधान रखा गया है। जबकि निजी क्षेत्र में बन रही परियोजनाओं में हस्ताक्षेप अनुबंधों की अनुपालन न होने पर कोई दंडात्मक कारवाई का प्रावधान नहीं है। कडच्छम वांगतू परियोजना 1045 मेगावाट हस्ताक्षरित हुयी थी और 2021 में इसके साथ अनुपूरक अनुबंध हुआ क्योंकि इसमें 45 मेगावाट क्षमता बढ़ा ली थी। परंतु इस बढ़ौतरी पर सरकार को कोई अतिरिक्त बिजली नहीं मिल रही। अब मार्च में इसे नोटिस जारी करना पड़ा है। लेकिन बोर्ड प्रबंधन के खिलाफ कोई कारवाई नहीं की गयी है। प्रदेश में स्थापित 172 परियोजनाओं में से 108 परियोजनाएं उत्पादन के बाद एल.ए.डी.एफ. नहीं दे रही है क्योंकि 2009 की अधिसूचना में इसके लिए प्रावधान ही नही किया गया। 18 परियोजना निर्माताओं ने इस अधिसूचना के खिलाफ अदालत से स्टे ले रखा है। राज्य क्षेत्र में जो परियोजनाएं चल रही हैं वह वर्ष में इतना समय रिपेयर आदि के नाम पर बन्द रहती हैं कि उसी से हानि की स्थिति पैदा हो जाती है जबकि निजी क्षेत्र की परियोजनाओं में रिपेयर आदि के लिए बहुत ही अल्प समय के लिए इन्हें बंद रखना पड़ता है। इसी में एक बड़ा खेल हो जाता है और किसी का ध्यान नहीं जाता। यही नहीं विद्युत ट्रांसमिशन की सारी जिम्मेदारी सरकार ने अपने ऊपर ले रखी है। इसी ट्रांसमिशन में 40% बिजली रास्ते में ही गायब हो जाती है जिसकी कीमत सरकार को चुकानी पड़ती है।
दूसरी ओर अपफ्रन्टमनी की करोड़ों की देनदारी सरकार के नाम पढ़ रही है जबकि यह परियोजनाएं लगने से पहले ही इनका आबंटन रद्द हो गया। आबंटितों ने नियमानुसार इनके लिए अपफ्रन्ट प्रीमियम जमा करवा रखा है लेकिन प्रशासनिक सहयोग समयानुसार न मिलने के कारण योजनाएं लग नहीं पायी और आबंटन रद्द हो गये। अब यह लोग अपना-अपफ्रन्ट वापस मांग रहे हैं। अदाणी पावर से शुरू हुई यह मांग ऊल डुग्गर और सैली परियोजना तक पहुंच गयी है। यह कंपनियां अपफ्रन्ट वापस दिये जाने के आदेश अदालतों से ले चुकी है। इनकी रकमों पर ब्याज की अदायगी भी करनी पड़ रही है। एक और सरकार ऊर्जा से आय बढ़ाने के प्रयासों में लगी है तो दूसरी और प्रशासन की नालायकी इस तरह से सरकार के प्रयासों पर भारी पड़ रही है। क्योंकि कंपनियां तो परियोजनाएं लगाने आती हैं लेकिन प्रशासन समय पर औपचारिकताएं पूरी नहीं करता है और परिणामस्वरूप परियोजनाओं का आबंटन रद्द हो जाता है और संबंधित प्रशासन की कोई जिम्मेदारी तय नहीं की जाती है। ऐसे में जब तक संबंधित प्रशासन की जवाबदेही तय नहीं की जाती है तब तक उर्जा क्षेत्र से अपेक्षित लाभ मिल पाना संभव नहीं होगा। क्या सुक्खू सरकार व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर प्रशासन को जवाबदेह बना पाती है या नहीं यह देखना दिलचस्प होगा। क्योंकि जिस तरह की चाल अब तक प्रशासन चलता आया है उसके चलते 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने की गारंटी तीन साल बाद भी पूरी होना कठिन है।
शिमला/शैल। सुक्खु सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए पुरानी पैन्शन योजना बहाल कर दी है। क्योंकि यह चुनावी वायदा और मंत्रिमण्डल की पहली ही बैठक में इसे लागू करने का वायदा किया गया था। इस आश्य का फैसला 13 जनवरी को लिया गया था। इस फैसले को प्रचारित प्रसारित करने के लिये सरकार ने 31 जनवरी तक 18 दिनों में 53,66,951 रुपये समाचार पत्रों, दूरदर्शन, आकाशवाणी व अन्य स्थानीय चैनलों के माध्यम से विज्ञापनों पर खर्च किये हैं। यह जानकारी 16-03-2023 को भरमौर के विधायक डॉ. जनक राज के प्रश्न के उत्तर में सरकार ने दी है। 24 समाचार पत्रों और चार स्थानीय चैनलों में यह विज्ञापन जारी किये गये हैं। सरकार की विज्ञापन नीति पिछली सरकार के समय से ही विवादित रही है। इस सरकार में भी यह विवाद बना हुआ है और अब तो मामला उच्च न्यायालय में भी पहुंच गया है। सर्वोच्च न्यायालय और प्रैस परिषद कुछ मामलों में यह स्पष्ट फैसले दे चुकी है कि विज्ञापनों पर खर्च होने वाला पैसा सरकारी धन है और उसके आबंटन में पक्षपात नहीं किया जा सकता। अभी पिछले दिनों पंजाब सरकार की मोहल्ला क्लीनिक योजना का विज्ञापन कुछ बाहर के प्रदेशों के अखबारों में देने की बात आयी थी। सरकार यह विज्ञापन देना चाहती थी इस पर शायद दस करोड़ खर्च होने थे। लेकिन संबंधित अतिरिक्त मुख्य सचिव ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि यह योजना पंजाब के लिये है। इसका प्रचार-प्रसार दूसरे प्रदेशों में पंजाब के पैसे से नहीं किया जा सकता।
यह प्रकरण यहां इसलिये प्रसांगिक हो जाता है की पुरानी पैन्शन हिमाचल के कर्मचारियों को मिली है। प्रदेश सरकार का यह अपना फैसला है और सिर्फ कर्मचारियों तक सीमित है। क्या इस फैसले को इस तरह विज्ञापनों के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित किया जाना आवश्यक है। हिमाचल में पर्यटन को छोड़कर ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित-प्रसारित किये जाने की आवश्यकता हो। फिर जिस तरह की वित्तीय स्थितियों से प्रदेश गुजर रहा है बढ़ते कर्ज के कारण हालात श्रीलंका जैसे होने की आशंका स्वयं मुख्यमंत्री व्यक्त कर चुके हैं। ऐसे में क्या इस तरह के खर्चों को जायज ठहराया जा सकता है शायद नहीं। यह ठीक है कि हर सरकार अपना प्रचार-प्रसार चाहती है। हिमाचल में भी यह चलन चल पड़ा है की सरकारें मीडिया मंचों के माध्यम से श्रेष्ठता के तमगे लेने की दौड़ में रहती है और इसके लिए उन समाचार पत्रों या मीडिया चैनलों का सहारा लिया जाता है जिनका प्रदेश में शून्य प्रभाव होता है। अभी जिन समाचार पत्रों और चैनलों को यह विज्ञापन जारी किये गये हैं यदि उनके चुनावी आकलन सही उत्तरते तो प्रदेश में कांग्रेस की सरकार कभी न बनती।
यह कड़वा सच है कि जनता की बात करने वाले और सरकार के फैसलों की निष्पक्ष समीक्षा करने वाले सरकार को अच्छे नहीं लगते हैं। ऐसे लोगों को सरकार का विरोधी करार देकर उनकी जबान बन्द करने का प्रयास किया जाता है। उनके विज्ञापन बन्द करके उनके प्रकाशनों को बन्द करवाने का प्रयास किया जाता है। पिछली सरकार के वक्त भी विज्ञापनों की जानकारी मांगने का प्रशन विधायक राजेन्द्र राणा और आशीष बुटेल की हर सत्र में आता रहा है और जयराम सरकार का अन्तिम सत्र तक ‘‘सूचना एकत्रित की जा रही है’’ का जवाब देकर ही प्रश्न टाला है। स्वभाविक है कि किसी प्रश्न का उत्तर लगातार तभी टाला जाता है जब उसमें कुछ घपला हुआ होता है। यह जवाब टालने का ही प्रयास है कि वह सरकार सारे दावों के बावजूद सत्ता से बाहर हो गयी। आज ऐसा लग रहा है कि सुक्खु सरकार की कुछ मामलों में जयराम सरकार के ही पद चिन्हों पर चल पड़ी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण से अधिक नहीं करने की नीति पिछली सरकार की भी थी और यह सरकार उसी पर अमल कर रही है इसलिए भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की फाइलों पर मुख्यमंत्री सचिवालय में भी महीनों तक कोई कारवाई नहीं हो रही है। पिछली सरकार के वक्त विज्ञापनों को लेकर जो सवाल पूछा गया था और जवाब टाला गया यदि उसी मामले की इमानदारी से पड़ताल की जाये तो बहुत कुछ चौंकाने वाला सामने आयेगा।
सूचना और जनसंपर्क विभाग सरकार का अति महत्वपूर्ण विभाग है। क्योंकि सूचना रखना और जन से संपर्क बनाना ही इसका दायित्व है। लेकिन संयोगवश यह विभाग यही काम नहीं कर रहा है। क्योंकि अभी तक भी विभाग में विभिन्न समाचार पत्रों की भूमिका के बारे में स्पष्ट नहीं है। जबकि भारत सरकार ने दैनिक सप्ताहिक समाचार पत्र और वैब पोर्टलों के लिए पीआईबी के माध्यम से कुछ मानक तय कर रखे हैं और छोटे पत्रों के लिये अपनी साइट का होना जरूरी कर रखा है ताकि वह संस्था और मुद्रण कि कुछ बाध्यताओं से मुक्त रह सकें। लेकिन प्रदेश का यह विभाग अभी भी भारत सरकार के मानकों का अनुसरण न करके विज्ञापनों को दण्ड और पुरस्कार के रूप में प्रयोग कर रहा है। यदि यही चलन जारी रहा तो इससे सरकार को ही नुकसान होगा यह तय है।
रोजगार गारंटी के परिप्रेक्ष में उठी चर्चा
उद्योग विभाग के 250 एमओयू में आना था 17063.22 करोड़
पर्यटन में 16559.94 करोड़ के 225 एमओयू हुये थे साइन
आवास में आना था 12054.50 करोड़ का निवेश
इस असफलता के लिये कौन है जिम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व या प्रशासन
शिमला/शैल। कांग्रेस ने जो दस गारंटीयां प्रदेश की जनता को चुनाव से पहले दी हैं उनमें से एक पांच लाख रोजगार उपलब्ध करवाने की भी है। सभी गारंटीयों को कैसे पूरा किया जायेगा इसके लिये रोडमैप तैयार करने का काम कुछ कमेटीयों को सौंपा गया है। पांच लाख रोजगार सरकार में ही सृजित नहीं किये जा सकते क्योंकि सरकारी कर्मचारियों की कुल संख्या ही तीन लाख से कम है। स्वभाविक है कि इतना रोजगार पैदा करने के लिये प्राईवेट सैक्टर का भी सहारा लेना पड़ेगा। प्राइवेट सैक्टर के निवेश की व्यवहारिक स्थिति क्या है इसकी जानकारी जयराम सरकार के समय में वर्ष 2019 में आयोजित ग्लोबल इन्वैस्टर मीट से जुटाई जा सकती है। धर्मशाला में आयोजित हुई इस मीट में निवेशकों को बुलाने के लिये देश और विदेश में रोड शो आयोजित किये गये थे। इन आयोजनों पर करीब 12 करोड़ रुपये खर्च हो गये हैं। लेकिन इतने बड़े आयोजन के बाद इस मीट का व्यवहारिक परिणाम क्या निकला है। स्मरणीय है कि इस मीट में 96720 करोड़ के प्रस्तावित निवेश के 703 समझौता ज्ञापन हस्ताक्षरित हुए थे और इस निवेश से 1,96,800 लोगों को रोजगार हासिल होने का दावा किया था। सरकार के 19 विभागों ने यह समझौता ज्ञापन साईन किये थे। यदि करीब एक लाख करोड़ के निवेश से करीब दो लाख रोजगार पैदा होने का अनुमान था तो पांच लाख रोजगार के लिए करीब चार लाख करोड़ का निवेश होना चाहिये।
इस निवेश मेले में सबसे अधिक 250ै ज्ञापन उद्योग विभाग ने साइन किये थे और इसमें 17063.22 करोड़ का निवेश होना था। दूसरे स्थान पर पर्यटन था और इसमें 16559.94 करोड़ के 225 ज्ञापन हस्ताक्षरित हुये थे। आयुष विभाग में 1269.25 करोड़ के निवेश के 45 ज्ञापन और उच्च शिक्षा में 1713 करोड़ के 44 एमओयू साईन हुए थे। हाउसिंग के 33 एमओयू में 12054.50 करोड़ निवेश होना था। इस मीट में जितना निवेश आने के एमओयू साईन हुये थे और रोजगार का दावा किया गया यदि इन दावों का आधा भी व्यवहार में होता तो प्रदेश पर शायद इतना कर्ज भी न होता और बेरोजगारी में देश के पहले छः राज्यों में प्रदेश न आता। आज भी सरकार पर्यटन के क्षेत्र में ए.डी.बी का 1311 करोड़ का कर्ज निवेश करने जा रही है। 2019 की ग्लोबल इन्वैस्टर मीट से पहले भी ए.डी.बी. का 256.99 करोड़ कर्ज निवेशित हो चुका है। लेकिन इस सबके बाद भी परिणाम यह है कि 28-9-2019 को हस्ताक्षरित हुए 225 एम ओ यू में से शायद एक भी जमीन पर नही उतर पाया है।
एमओ यू को अमलीजामा पहनाने के लिये तीन बुनियादी आवश्यकताएं होती हैं। पहली जमीन दूसरी कैपिटल और तीसरी मार्केटिंग। यदि इनमें से एक की भी कमी हो तो कोई भी परियोजना सिरे नहीं चढ़ती है। इसलिये जिस इन्वैस्टर मीट पर प्रदेश के आम आदमी का करोड़ों रुपया आयोजन पर निवेश कर दिया गया है उसके वांछित परिणाम क्यों सामने नहीं आये हैं यह कारण जानने का आम आदमी को अधिकार है। यह सामने आना चाहिये कि क्या सरकार इन लोगों को जमीन ही उपलब्ध करवा पायी। या इनके पास वांछित कैपिटल का अभाव था या निवेश के बाद मार्केटिंग की सुविधायें नहीं थी। जिन विभागों ने यह एमओयू साइन किये थे उन्होंने इन्हें अमलीजामा पहनाने के लिये क्या कदम उठाये? क्या निवेशकों से कोई पत्राचार किया गया तो उसका क्या परिणाम सामने आया। यह सब प्रदेश के आम आदमी के सामने रखा जाना चाहिये। क्योंकि इस सरकार को भी वायदा किये रोजगार पैदा करने के लिए प्राइवेट सैक्टर का ही सहारा लेना पड़ेगा। पिछली सरकार ने ग्रामीण विकास विभाग के तहत दो रोजगार योजनाएं घोषित की थी। अब इस सरकार ने उन दोनों योजनाओं को एक करके उद्योग विभाग को जिम्मेदारी दे दी है। लेकिन उन योजनाओं के तहत कितने लोगों को रोजगार मिल पाया है इसका कोई आंकड़ा सामने नहीं आ पाया है। यदि डबल इंजिन की सरकार के समय में भी निवेशक प्रदेश में नहीं आ पाया है तो आज कैसे आ पायेगा यह बड़ा सवाल है। जबकि प्रधानमंत्री और केन्द्रिय वित्त मन्त्री हर आदमी को कर्ज के लिये प्रेरित कर रहे थे। बैंकों को खुले मन से कर्ज बांटने के निर्देश थे। इस सबके बावजूद प्रदेश में यह प्रस्तावित निवेश क्यों नहीं आ पाया इसके कारण सामने आने ही चाहिये।
यह था प्रस्तावित निवेश
विभाग एमओयू निवेश
1. कृषि 2 225 करोड़
2.आयुष 45 1269.25 करोड़
3.प्रारंभिक शिक्षा 5 6.85 करोड़
4.उच्च शिक्षा 44 1713 करोड़
5. मत्स्य पालन 1 7 करोड़
6. वन 1 25 करोड़
7. स्वास्थ्य 5 632 करोड़
8.बागवानी 6 77.55 करोड़
9. उद्योग 250 17063.22 करोड़
10.आईटी 14 2833.21 करोड़
11. भाषा कला संस्कृति 1 25 करोड़
12. उर्जा 18 34112 करोड़
13. कौशल विकास 7 15 करोड़
14. खेल 2 116 करोड़
15.तकनीकी शिक्षा 1 300 करोड़
16. पर्यटन 225 16559.94 करोड़
17. परिवहन 13 3658 करोड़
18. शहरी विकास 30 6027.66 करोड़
19. आवास 33 12054.50 करोड़
The Joomla! content management system lets you create webpages of various types using extensions. There are 5 basic types of extensions: components, modules, templates, languages, and plugins. Your website includes the extensions you need to create a basic website in English, but thousands of additional extensions of all types are available. The Joomla! Extensions Directory is the largest directory of Joomla! extensions.
We search the whole countryside for the best fruit growers.
You can let each supplier have a page that he or she can edit. To see this in action you will need to create a users who is in the suppliers group.
Create one page in the growers category for that user and make that supplier the author of the page. That user will be able to edit his or her page.
This illustrates the use of the Edit Own permission.