Friday, 05 June 2026
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कौन होगा कांग्रेस में मुख्यमंत्री अटकलों का बाजार हुआ गर्म

क्या नेतृत्व की रेस में अहम टकरायेगे?

क्या वरियता को अधिमान मिलेगा?

शिमला/शैल। कौन होगा कांग्रेस में अगला मुख्यमंत्री प्रशासनिक गलियारों से लेकर राजनीतिक दलों के कार्यालयों तक में यह सवाल इन दिनों सबसे अधिक अटकलों का केन्द्र बना हुआ है। क्योंकि प्रशासन के शीर्ष पर बैठे जिन अधिकारियों के पास दिन में दो-दो बार फील्ड से फीडबैक आता है उनके एक बड़े वर्ग ने कांग्रेस के सम्भावित मुख्यमन्त्रीयों के यहां दस्तक देना शुरू कर दिया है। चर्चा है कि जयराम सरकार में जिस अधिकारी ने मुख्य सचिव के पद तक सात अधिकारियों को पहुंचा कर प्रशासनिक स्थिरता की बलि ले ली और मुख्यमन्त्री को इस बारे में सचेत तक होने का अवसर नहीं दिया उसी अधिकारी ने अपने पयादो के साथ यह खेल खेलना शुरू कर दिया है। चर्चा तो यहां तक है कि इनकी हाजिरी का प्रमाण किसी ने फोटो के साथ जयराम को भी भेज दिया। यह फोटो देखकर जयराम ठाकुर की प्रतिक्रिया क्या रही होगी इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। यह एक स्थापित सच है कि जब जहाज डूबने लगता है तो सबसे पहले चूहे उसे छोड़ कर भागना शुरू करते हैं। सत्ता परिवर्तन के यह अच्छे संकेत हैं। लेकिन इन्हीं संकेतों का दूसरा पक्ष उतना ही गंभीर है। क्योंकि भाजपा में इन चुनावों के लिए जयराम से ज्यादा प्रधानमन्त्री, गृह मन्त्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा सभी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठाएं दांव पर लगी हुई है। गैर भाजपा शासित कितने राज्यों में ऑपरेशन लोटस चलाकर सरकारें गिराने के प्रयास हो चुके हैं यह पूरा देश जानता है। ऐसे में जहां अभी चुनाव चल रहे हैं उन राज्यों में सत्ता के लिए भाजपा किसी भी हद तक जाने का प्रयास कर सकती हैं इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मतदान और मतगणना के बीच रखा गया लम्बा अन्तराल कई आशंकाओं की ओर संकेत करता है। रामपुर और घुमारवीं में ईवीएम मशीनों को लेकर सामने आई आशंकाओं को यदि कांग्रेस का आधारहीन डर भी मान लिया जाये तो उना में चुनाव आयोग को इन मशीनों की पहरेदारी के लिए स्वयं टैन्ट लगाकर क्यों बैठना पड़ा यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब शायद चुनाव आयोग के पास भी नहीं है।
इस परिदृश्य में जब कांग्रेस के अंदर यह सवाल उठा ही दिया गया है कि उसका मुख्यमन्त्री कौन होगा तब यह भी साथ ही याद रखना होगा कि नेतृत्व का यह सवाल स्वयं प्रधानमन्त्री तक कांग्रेस पर दाग चुके हैं। उससे यह संकेत स्पष्टतः उभरते हैं कि आने वाले दिनों में नेतृत्व के प्रशन को आन्तरिक विरोधाभासों को उभारने का एक बड़ा माध्यम बनाया जाएगा। क्योंकि अभी प्रदेश कांग्रेस में स्थापित नेतृत्व उभरने में समय लगेगा। वर्तमान में कांग्रेस के अन्दर अभी ऐसा कोई बड़ा नाम नहीं है जो अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर भी अपना वोट किसी के पक्ष में ट्रांसफर करने की बूकत रखता हो। विश्लेषकों की नजर में इसी के कारण कांग्रेस के दो विधायक और दो कार्यकारी अध्यक्ष पार्टी छोड़कर भाजपा में गये हैं। इसी के साथ एक सच यह भी है कि कांग्रेस को उपचुनाव से लेकर इन आम चुनाव तक स्व. वीरभद्र सिंह के प्रति जनता के प्यार और सहानुभूति का भरपूर लाभ मिला है। प्रतिभा सिंह को इन परिस्थितियों में पार्टी का अध्यक्ष बनाना भी एक सही फैसला रहा है। क्योंकि प्रतिभा सिंह के कारण ही वीरभद्र सिंह के विश्वस्त रहे सेवानिवृत्त अधिकारियों और दूसरे लोगों ने चुनाव के दौरान पार्टी कार्यालय को संभाल लिया। कांग्रेस जो आरोप पत्र नहीं ला पायी थी उसे इन्हीं लोगों ने चुनाव प्रचार के दौरान जनता तक पहुंचाया। भाजपा शायद यह मानकर चल रही थी कि जब उसने नेता प्रतिपक्ष और चुनाव कैंपेन कमेटी के चेयरमैन को प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री की रैलियां रखवाकर उनके चुनाव क्षेत्रों में ही बांध कर रख दिया तो इसका सीधा असर कांग्रेस कार्यालय पर पड़ेगा। लेकिन वीरभद्र के विश्वस्त रहे इन अधिकारियों ने संगठन के पदाधिकारी हुए बिना ही कार्यालय को संभाल कर भाजपा की रणनीति पर ग्रहण लगा दिया। इसी प्रबन्धन के दम पर प्रतिभा सिंह पैंतालीस और विक्रमादित्य, मुकेश और सुक्खु दस-ग्यारह रैलियां विभिन्न क्षेत्रों में कर पाये।
यह सही है कि भाजपा के मुकाबले कांग्रेस का संगठन बहुत कमजोर था। धनबल में भी कांग्रेस भाजपा के बराबर नहीं थी। लेकिन जनता जिस कदर महंगाई और बेरोजगारी से पीड़ित थी उसके चलते जनता सत्ता परिवर्तन के लिए मन बना चुकी थी। ऐसे में कांग्रेस को जनसमर्थन मिलने जा रहा है वह जनता का रोष पोषित विश्वास है। इस विश्वास को यदि कोई भी मुख्यमन्त्री होने के अहम में कमजोर करने का प्रयास करेगा उसे जनता बर्दाशत नहीं करेगी। स्व. वीरभद्र के प्रति जनता की सहानुभूति का लाभ अब के बाद नहीं मिलेगा। ऐसे में यदि विधायकों के बहुमत को नजरअंदाज करके मुख्यमन्त्री थोपने का प्रयास किया जायेगा तो उसके परिणाम घातक होंगे। क्योंकि कांग्रेस के पास अनुभवी विधायकों की लम्बी लाइन उपलब्ध रहेगी ऐसा माना जा रहा है।

क्या आप इस चुनाव में अपने को प्रमाणित कर पायेगी

शिमला/शैल। देश के दो राज्यों दिल्ली और पंजाब में आप की सरकारें हैं। इन्हीं सरकारों के दम पर आप नेे हिमाचल में भी चुनाव लड़ने का दम भरा और 67 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। पंजाब में सरकार बनने के बाद जिस जोश और उम्मीद के साथ आप ने प्रदेश में कदम रखा था वह चुनाव के अन्त तक बना नहीं रह सका है। बल्कि अन्त तक आते-आते यह सवाल अहम हो गया कि आप प्रदेश में इतना वोट शेयर ले पायेगी जिसके सहारे वह राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्तकर पाये। आप को लेकर यह चर्चा उठाना इसलिये आवश्यक हो जाता है क्योंकि आप भी अन्ना आन्दोलन की कोख से निकली है। आप के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली एक जैसी ही है। दोनों नेता मीडिया के सहारे ज्यादा प्रचारित हैं जबकि जमीनी हकीकत वास्तविकता से बहुत दूर है। आज पंजाब में आम आदमी पार्टी को बिजली की दरों में बढ़ौतरी करनी पड़ी है और इस बढ़ौतरी पर हिमाचल तक में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। आम आदमी में आप की मुफ्ती योजनाओं को लेकर एक समय जो सवाल उठे थे उनका सच इस बढ़ौतरी से सामने आ गया है। इन्ही चुनावों में कजरीवाल ने करंसी नोटों पर लक्ष्मी और गणेश के चित्र छापने का हिन्दु कार्ड प्ले करने का प्रयास किया और उस पर सवाल उठे। इसी हिन्दु कार्ड के नाम पर आप विलकिस बानो प्रकरण पर मौन रही। इन्हीं कारणों से आप पर संघ प्रायोजित भाजपा की बी टीम होने के आरोप लगते आ रहे हैं।
हिमाचल में आप की परफॉरमैन्स नहीं के बराबर मानी जा रही है। लेकिन आप को पंजाब और दिल्ली में इसकी सरकारें होने से आसानी से राइट ऑफ भी नहीं किया जा सकता है। यह माना जा रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी आप अपरोक्ष में भाजपा की सहायक सिद्ध होगी जैसा कि इस चुनाव में हुआ है। भाजपा की अपरोक्ष सहायक होने के कारण ही आप अभी तक विपक्षी एकता का हिस्सा नहीं बन पा रही है। आप के इस राजनीतिक चरित्र के परिदृश्य में यह सवाल उठाये जाने आवश्यक हो जाते हैं कि हिमाचल में जिन तेवरों के साथ आप ने प्रदेश में कदम रखा था उसको अन्त तक निभाया क्यों नहीं गया? क्या आम आदमी का दम भरने वाली आप भी भाजपा या कांग्रेस में सेन्धमारी करके वहां से कोई बड़े नाम इम्पोर्ट करके आगे बढ़ना चाहती है। आज हिमाचल के संद्धर्भ में आप से जुड़े कार्यकर्ताओं को अपने नेतृत्व से यह सवाल पूछना आवश्यक हो जाता है कि प्रदेश को लेकर उनकी नीयत क्या है क्योंकि 2024 के चुनावों के परिदृश्य में यह महत्वपूर्ण हो जाता है।

10 अप्रैल 1999 को पुरानी पैन्शन के स्थान पर नई पैन्शन योजना लागू करने का एम ओयू साईन हुआ था

शिमला/शैल। आज हिमाचल ही नहीं वरन देश के उन 21 राज्यों के कर्मचारी पुरानी पैन्शन योजना पुनः बहाल करने की मांग कर रहे हैं। कुछ गैर भाजपा शासित राज्यों ने इसे बहाल भी कर दिया है। छत्तीसगढ़ की तर्ज पर अब पंजाब में इसे बहाल करने का फैसला कर लिया है। हिमाचल के चुनावों में कांग्रेस ने दस गारंटियों में इसे पहला स्थान दिया है और सरकार बनने पर मंत्रिमण्डल की पहली ही बैठक में इसे लागू करने का वायदा भी कर दिया है। लेकिन भाजपा इस मुद्दे पर अभी भी असमंजस में चल रही है। बल्कि कुछ कर्मचारी नेता पुरानी पैन्शन योजना खत्म करने का आरोप कांग्रेस पर लगा रहे हैं। इस समय यह मुद्दा केन्द्रिय मुद्दा बन चुका है। इसलिये पूरे दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ इसे जनता के बीच रखा जाना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि इसके प्रभाव दुरगामी होंगे। स्मरणीय है कि 1999 में प्रदेश में भी और केन्द्र में भी भाजपा की सरकारें थी। बल्कि केन्द्र में तेरह दिन तेरह महीनों के बाद मार्च 1999 में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी थी और इस सरकार में अरुण शोरी के अधीन पहली बार देश को विनिवेश मंत्रालय देखने को मिला था। यह विनिवेश मंत्रालय भाजपा का एक नीतिगत फैसला था। स्वभाविक था कि जब भी इस फैसले के तहत सार्वजनिक उपक्रमों में सरकारी निवेश को घटाया जाता तो इसका सीधा प्रभाव कर्मचारियों पर पड़ता। इसलिये केन्द्र ने सभी विशेष श्रेणी राज्यों सहित 21 राज्यों के साथ एमओयू साइन किया जिसकी हर शर्त कर्मचारियों को प्रभावित करती थी। उस समय कुछ गैर भाजपा शासित राज्यों ने इसे साइन करने से मना भी कर दिया था। लेकिन हिमाचल की भाजपा सरकार ऐसा नहीं कर पायी।

2003 में जब प्रदेश में सरकार कांग्रेस की बन गयी तब यह मुद्दा फिर उठा क्योंकि 1999 में हुये एमओयू को ज्यादा प्रचारित नहीं किया गया था। तब वीरभद्र सरकार ने मई 2004 में बड़े प्रयत्नों से केंद्र के साथ एक नया एमओयू साइन करके पुराने में कुछ संशोधन करवाये। इन संशोधनों के बाद भाजपा ने अपने ऊपर लग रहे कर्मचारियों की पैन्शन खत्म करने के आरोप को कांग्रेस के नाम लगाना शुरू कर दिया। विधानसभा के अन्दर इस पर भारी हंगामा हुआ था। तब सरकार ने इन समझौता ज्ञापनों का सच जनता के सामने रखा। इसके लिए सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने दिसम्बर 2004 में ‘‘समझौता ज्ञापन तथ्य क्या है ?’’ नाम से एक लघु पुस्तिका प्रकाशित की थी। इस पुस्तिका में सारे तथ्य दर्ज हैं। अप्रैल 1999 में क्या साईन हुआ था मार्च 2004 में क्या साईन हुआ था दोनों ज्ञापन इसमें दर्ज हैं। इनको पढ़े बिना यह आरोप लगाना सही नहीं होगा की कौन सी सरकार कर्मचारियों की हितैशी रही है। आज शायद राजनेता और कर्मचारी नेता दोनों को ही इस समझौता ज्ञापन की जानकारी नहीं है। इसलिये इस समझौता ज्ञापन का दस्तावेज पाठकों के सामने रखा जा रहा है ताकि इतने संवेदनशील मुद्दे पर आप अपनी राय बना सकें।






























 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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