चुनाव परिणामों ने मण्डी बनाम हिमाचल के आरोपों को किया प्रमाणित
क्या यह 2024 के लोकसभा चुनाव के लिये बिछाई गयी विसात है
शिमला/शैल। हिमाचल की जयराम सरकार डबल इंजन से ड्राइव होने के बावजूद सत्ता में वापसी नहीं कर पायी है। बल्कि 12 में से 9 मंत्री चुनाव हार गये सोलन और हमीरपुर जिलों में भाजपा का खाता भी नहीं खुल पाया है। कांगड़ा ऊना और शिमला में भी बहुत निराशाजनक प्रदर्शन रहा है। दोनों जनजातियों जिले भी हाथ से निकल गये हैं। यदि मंडी और बिलासपुर का प्रदर्शन भी कहीं कांगड़ा जैसा ही रहता तो कांग्रेस का आंकड़ा निश्चित रूप से 50 हो जाता। शैल लगातार इस ओर यह संकेत करती रही है। भाजपा के लिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से लेकर गृह मंत्री अमित शाह तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक भाजपा का सारा शीर्ष नेतृत्व चुनाव प्रचार में लगा था। जब सुरेश भारद्वाज को शिमला से कुसुम्पटी बदला गया तब यह कहा गया था कि यह बदलाव हाईकमान के कहने से किया गया है और उन्हें जिताने की जिम्मेदारी भी हाईकमान की है। यह कहा गया था कि भारद्वाज का चुनाव क्षेत्र जे.पी. नड्डा के निर्देश पर बदला गया है। जे.पी. नड्डा हिमाचल में मंत्री रह चुके हैं। इसलिए वह प्रदेश के हर कोने से परिचित हैं। प्रदेश में जब भी नेतृत्व परिवर्तन या कुछ अन्य मंत्रियों की छंटनी करने या विभाग बदलने की चर्चाएं उठती थी और अन्त में उनका परिणाम कुछ भी नहीं निकलता था। तो यह सब नड्डा प्रदेश से ताल्लुक रखने के कारण होता था। राष्ट्रीय अध्यक्ष होने और हिमाचल से ताल्लुक रखने के कारण यह नड्डा का अपना विशेषाधिकार था कि हिमाचल सरकार में कोई बदलाव किया जाना चाहिए या नहीं। इसी के साथ अगर सरकार की परफॉरमैन्स पर बात करें तो इस सरकार पर इसके अपने ही लोगों ने पत्र बम्बों से पहले ही वर्ष से हमले करने शुरू कर दिए थे और अन्त तक पहुंचते-पहुंचते लगभग हर मंत्री इन हमलों का शिकार हुआ। इन्हीं हमलों का परिणाम रहा है निदेशक स्वास्थ्य की गिरफ्तारी। लेकिन सरकार इन हमलों का गंभीरता से संज्ञान लेने की बजाये पार्टी के भीतर और बाहर अपने विरोधियों को दबाने के प्रयास में लगी रही। इस प्रयास के कारण सरकार भ्रष्टाचार का पर्याय बन कर रह गयी। जनता को घोषणाओं और आश्वासनों के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला। क्योंकि केंद्र से कोई अलग से आर्थिक सहायता मिल नहीं पायी। केंद्र की हर घोषणा सैद्धांतिक स्वीकृति से आगे नहीं बढ़ पायी। डबल इंजन के कारण प्रदेश नेतृत्व इस पर मुंह नहीं खोल पाया। ऊपर से प्रशासन ने कर्ज का ऐसा सूत्र पकड़वा दिया जिसके कारण पद को जिम्मेदारी से ज्यादा भोग का केंद्र बना दिया। राजनीतिक मुहाने पर वस्तु स्थिति यह थी कि जगत प्रकाश नड्डा धूमल काल में जिस तरह से केंद्र में धकेले गये थे वह उससे खुश नहीं थे इसलिए भीतर से धूमल को विरोधी मानते थे। 2017 का चुनाव धूमल के नेतृत्व में लड़ा गया सरकार तो बन गयी लेकिन धूमल और उनके कुछ विश्वसत साथी चुनाव हार गये। इस हार के कारण नये नेता के रूप में जयराम और नड्डा के गठजोड़ ने पहले दिन से ही धूमल को निशाने पर लेना शुरू कर दिया। मानव भारती विश्वविद्यालय प्रकरण में यह खेल खुलकर सामने आ गया। जब पार्टी के भीतर इस तरह की खेमेबाजी उभर गयी तो सारे खेमे एक दूसरे को निपटाने में ही व्यस्त हो गये। इसमें प्रशासन बिल्कुल अराजक हो गया। क्योंकि सरकार पर ऐसे सत्ता केंद्रों का कब्जा हो गया जिसके लिये सुशासन एक शब्द से अधिक कुछ नहीं था। सत्ता में वापसी के लिये मोदी के नाम की माला फेरने को गारंटी मान लिया था। इस खेल में धूमल परिवार को हाशिये पर धकेलना ही प्राथमिकता बन गया। जिस तरह के ब्यान नड्डा और भारद्वाज के आये उनसे यह संकेत गया कि 2017 में धूमल की हार प्रायोजित थी। सरकार की परफॉरमैन्स को लेकर यह आरोप सदन के अन्दर और बाहर लगने शुरु हो गये कि विकास में मण्डी बनाम पुरा प्रदेश होता जा रहा है। कई विभागों के कार्यालय दूसरे जिलो से उठाकर मण्डी लाये गये। मण्डी में भी ज्यादा प्राथमिकता सिराज और धर्मपुर को दिये जाने के आरोप लगे। भेदभाव के यह आरोप उस समय और भी ज्यादा गंभीर हो गये जब मंत्री महेन्द्र सिंह की बेटी को धरने पर बैठने की नौबत आ गयी। पार्टी और सरकार में ऐसे लोगों का दबदबा बढ़ता गया जो सीधे सरकार में शामिल ही नहीं थे। लेकिन मुख्यमन्त्री किन्ही कारणों से इस पर आंखें मुंदे रहे। अब चुनाव परिणामों ने भी मण्डी बनाम शेष हिमाचल के आरोपों को प्रमाणित कर दिया है। बिलासपुर सदर में जिस तरह से 477 पोस्टल मतों की गिनती राजनीतिक दबाव में न किये जाने के आरोप लगे हैं उससे जे.पी. नड्डा भी निशाने पर आ गये हैं। मण्डी और बिलासपुर की जीत को एक सुनियोजित डिजाइन के रूप में देख जा रहा है। शिमला और हमीरपुर संसदीय क्षेत्रों की हार को भी इसी आयने में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि यह सब 2024 के चुनावों को सामने रखकर बिछाई गयी विसात है।
शिमला/शैल। संविधान दिवस के अवसर पर किसानों ने फिर सरकार के खिलाफ धरने देकर विरोध प्रदर्शन किया है और महामहिम राष्ट्रपति को प्रशासन के माध्यम से देश भर में ज्ञापन सौंपा है। इस विरोध और ज्ञापन के माध्यम से सरकार पर वादा खिलाफी का आरोप लगाया गया है। स्मरणीय है कि जब केन्द्र सरकार ने कोविड काल में तीन कृषि कानून पारित किये और उन्हें लागू करने का प्रयास किया था तब इन कानूनों के खिलाफ देशभर में रोष फूट पड़ा था। कानून वापस लेने की मांग पूरे देश में उठ गयी थी। किसानों को आन्दोलन का रास्ता अपनाना पड़ा था। आजाद भारत का यह सबसे बड़ा आन्दोलन रहा है जो एक वर्ष से भी ज्यादा समय तक चला। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस आन्दोलन पर प्रतिक्रियाएं उभरी हैं। इस आन्दोलन को असफल बनाने के लिए सरकार किस हद तक चली गई थी आज इसे दोहराने की जरूरत नहीं है क्योंकि पूरे देश में वह सब कुछ देखा है। संसद से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय तक आन्दोलन की आहट पहुंची है।
इसी परिदृश्य में 9 दिसंबर 2021 को सरकार की ओर से संयुक्त किसान मोर्चा के नाम आये पत्र के आधार पर 11 दिसंबर 2021 को इस आंदोलन को रोक दिया गया। किसानों ने अपने धरने प्रदर्शन उठा लिये। सरकार ने किसानों की मांगे स्वीकार करने का लिखित आश्वासन दिया। लेकिन इस आश्वासन के बाद एक वर्ष से भी अधिक का समय बीत जाने पर भी मांगो की दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया है। बल्कि सरकार की नीयत पर फिर से सन्देह के बादल छाने लगे हैं। सरकार की नीयत को भांपते हुये किसानों ने संविधान दिवस पर यह ज्ञापन राष्ट्रपति को सौंपा है। संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में सौंपे गये ज्ञापन को यथास्थिति पाठकों के सामने रखा जा रहा है।



शिमला/शैल। कांग्रेस प्रदेश में अगली सरकार बनाने जा रही है यह मानना है राजनीतिक विश्लेषकों का। बल्कि पत्रकारों का वह वर्ग भी ऐसा ही मान रहा है जो मतदान से पहले तक यह लिख रहा था कि भाजपा इस बार जीत का नया रिकॉर्ड स्थापित करेगी। कांग्रेस संगठन और साधनों के स्तर पर भाजपा से जिस कदर कमजोर थी प्रदेश की जनता ने उसी को सामने रखकर कांग्रेस को इतना समर्थन दिया है कि भाजपा का कोई भी प्रयास कांग्रेस को तोड़ नहीं पायेगा। विश्लेषकों की नजर में यह मतदान भाजपा के जुमलों पर उभरे जनाक्रोश पर जनता का कांग्रेस के प्रति एकतरफा समर्थन रहा है। यदि आप या निर्दलीय प्रदेश में एक दो सीट निकाल पाये तो शायद भाजपा को दहाई का आंकड़ा छूना भी कठिन हो जायेगा। लेकिन इसी सबके साथ एक कड़वा सच यह भी है कि भाजपा की केन्द्र में ही सरकार है और 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं। इन चुनाव में हिमाचल और गुजरात दोनों जगह भाजपा का चुनाव प्रचार केन्द्रीय नेतृत्व पर केंद्रित हो गया है। उससे इन चुनावों में सीधे प्रधानमन्त्री की अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लग गयी है। गुजरात में प्रधानमन्त्री ने जिस तरह से वहां की जनता के सामने यह रखा कि विपक्ष मेरी औकात को चुनौती दे रहा है उससे यह प्रमाणित होता है कि यह चुनाव प्रधानमन्त्री केन्द्रित हो गया है। गुजरात में जिस तरह से प्रधानमन्त्री और योगी आदित्यनाथ की जनसभाओं में कुर्सियां खाली रहने के वीडियो सामने आ चुके हैं उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वहा भी स्थिति ज्यादा सुखद नहीं है। गुजरात को लेकर यह टिप्पणी हिमाचल के लिये एक स्पष्ट चेतावनी बन जाती है। क्योंकि भाजपा के लिये हिमाचल हारने के मायने बहुत गंभीर हो जाते हैं और कांग्रेस के अंदर किसी भी तरह से तोड़फोड़ करने के अलावा और कोई विकल्प भाजपा के पास नहीं रह जाता है।
इस परिपेक्ष में यदि चुनाव घोषित होने से पहले के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डाली जाये तो मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर के इन बयानों से कि कांग्रेस चुनाव लड़ने लायक ही नहीं बचेगी। भाजपा अपने आरोप पत्र को सीबीआई को भेज देगी। इन्हीं बयानों के बीच कांग्रेस विधायक विक्रमादित्य सिंह का यह ट्वीट आया था कि सीबीआई का स्वागत है। उस समय कांग्रेस के कई नेताओं के नाम मीडिया में उछले थे कि यह लोग भाजपा में जा सकते हैं। पवन काजल और लखविंदर राणा तभी भाजपा में चले गए थे। उसके बाद हर्ष महाजन और मनकोटिया के जाने के कयास और पुख्ता होते जा रहे थे। यदि उस समय विधायक अनिरुद्ध सिंह ने सीधे मुख्यमन्त्री कार्यालय पर ही हमला न बोला होता तो स्थितियां उस समय भी बिगड़ने के कगार पर पहुंच चुकी थी।
लेकिन इसके बाद टिकट आवंटन पर जो स्थितियां दोनों दलों के भीतर उभरी उनमें यह भी चर्चा में आ गया है कि भाजपा ने कांग्रेस के कुछ कमजोर उम्मीदवारों की आर्थिक सहायता की है। कुछ स्थानों पर भाजपा उम्मीदवारों के खिलाफ ही कांग्रेसियों की मदद की गयी है। अभी जिस तरह से मीडिया के कुछ प्रमुख लोगों के साथ मुख्यमन्त्री की बैठक के होने की चर्चा है उसमें सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के अन्दर जीतने के बाद कैसे तोड़फोड़ को अंजाम दिया जा सकता है उसके लिए एक उपयुक्त पृष्ठभूमि तैयार करने की योजना बनाई जा रही है। इस योजना के तहत कांग्रेस के अन्दर मुख्यमन्त्री पद के दावेदारों की लम्बी सूची जन चर्चा में डालने का प्रयास किया जायेगा। ताकि इस पद के दावेदारों की महत्वकांक्षाओं को इतना उभार दे दिया जाये कि स्थितियां मतभेदों से चलकर मनभेदों की स्थिति तक पहुंच जाये। कुछ लोगों के खिलाफ ई.डी.या आयकर की नौबत लाने के लिए पुराने आरोप पत्रों को खंगाला जा रहा है। चर्चा है कि हर्ष महाजन तोड़फोड़ का मास्टर प्लान तैयार करने की योजना पर लग गये हैं। भाजपा की यह योजना कितनी कारगर साबित होती है यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद पता चलेगा। लेकिन इसका पूर्व आकलन कांग्रेस को भविष्य के प्रति सजग और सचेत रहने का एहसास अवश्य करवाता है। क्योंकि केन्द्रिय एजेंसियों के सहारे भाजपा कई राज्यों में सरकारें तोड़ने का प्रयास कर चुकी है।
आज यह चर्चा उठाना इसलिये प्रसांगिक हो जाती है कि पिछले दिनों कांग्रेस के कई नेता दिल्ली में केन्द्रिय नेताओं से मिलने आ चुके हैं। कई तो कुछ संभावित विधायकों को लेकर दिल्ली यात्रा कर चुके हैं। दिल्ली जाने वाले सभी वरिष्ठ नेताओं को संभावित मुख्यमन्त्री का चेहरा करार दिया गया है। यही संभावना आपसी मतभेदों का आधार न बन जाये यह आशंका बराबर बनी हुई है। शायद इसी आशंका के चलते सोनिया गांधी ने कुछ नेताओं को मिलने का समय नहीं दिया है। बल्कि यह सामने आया है कि हाईकमान ने कुछ मानक तय किये हैं जो मुख्यमन्त्री होने के लिये कसौटी बनेंगे। यह सही है कि प्रदेश अध्यक्ष से लेकर नेता प्रतिपक्ष और प्रचार कमेटी के चेयरमैन तक सभी नेता इसके पात्र हैं लेकिन फिर भी यह फैसला विधायकों की आम राय से ही होना चाहिए।
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