क्या सक्सेना सरकारी गवाह बनकर भी ओडीआई सूची से बाहर आ पायेंगे
शिमला/शैल। क्या मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर और उनकी सरकार पूर्व केन्द्रिय वित्त मंत्री पी चिदम्बरम के खिलाफ बनाये गये आई एन एक्स मीडिया केस को जायज नहीं मानती है? क्या यह सरकार अपने प्रधान सचिव वित्त प्रबोध सक्सेना को इस केस में सरकारी गवाह बनाने का प्रयास कर रही है? जब से इस मामले में चिदम्बरम की गिरफ्तारी हुई है तभी से यह सवाल प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। क्योंकि इस प्रकरण में चिदम्बरम की गिरफ्तारी हो गयी लेकिन जिन अधिकारियों की अनुशंसा का चिदम्बरम ने बतौर वित्तमन्त्री अनुमोदन किया उनकी कोई गिरफ्तारी नही हुई। फिर अदालत ने चिदम्बरम की जमानत याचिकाएं भी यह कहकर खारिज की कि वह जमानत पर आने के बाद गवाहों और सबूतों को प्रभावित करेंगें जबकि इसी पर यह सवाल खड़ा होता है कि चिदम्बरम के साथ सहः अभियुक्त बने सक्सेना आदि अधिकारी क्या बाहर रहकर अपने खिलाफ सबूतों को पुख्ता करेंगे? क्योंकि कानून की यह स्थापित स्थिति है कि अकेले मन्त्री अपने स्तर पर ही ऐसे मामलों में भ्रष्टाचार नहीं कर सकता जिनकी फाईल नीचे विभाग के अधिकारियों से होकर उसके पास आनी हो। फिर अब तक जो जांच इस मामले में हुई है उसमें किसी भी स्टेज पर किसी भी अधिकारी का ऐसा कोई कथन सामने नहीं आया है जिसमें किसी ने भी यह कहा हो कि उसने ऐसा मन्त्री का दवाब आने के बाद किया है। अब तो इस मामले में अदालत में आरोप पत्र भी दायर हो गया है जिसका अर्थ है कि इसमें संवद्ध हर अधिकारी अपने अपने स्तर पर अपने अपने कृत्य के लिये स्वयं में ही जिम्मेदार है।
अब इस मामले में चालान दायर हो गया है और सक्सेना भी इसमें एक अभियुक्त नामजद हैं। यह मामला कितना हाई प्रोफाइल है और कालान्तर में इसका सरकार की साख पर कैसा असर पड़ेगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि आखिर प्रबोध सक्सेना को लेकर जयराम सरकार की नीयत और नीति क्या है। क्योंकि सक्सेना के पास आज भी सरकार के महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी कायम है। जबकि सरकार के गृह एवम विजिलैन्स विभाग द्वारा 23 अप्रैल 2011 को सारे प्रशासनिक सचिवों को जारी पत्र के अनुसार सक्सेना सन्दिग्ध निष्ठा वाले अधिकारियों की श्रेणी में आते हैं और ऐसे लोगों को अहम पदों की जिम्मेदारी नही सौंपी जा सकती है। ओडीआई लिस्ट को लेकर अभी पिछले दिनों जयराम सरकार ने भी एक पत्र जारी करके भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरैन्स के दावे को दोहराने का प्रयास किया है। अप्रैल 2011 में जारी पत्र में साफ शब्दों में कहा गया है कि ओडीआई सूची के मानक यह होंगे।
As per the said scheme, the names of those officers/officials are to be included in these lists who have been (i) either convicted by the court or against whom criminal proceedings are pending in the court or(ii) who have been awarded major penalty after departmental action or against whom departmental proceedings for major penalty are in process at department level or(iii) who have been prosecuted but have been acquitted on technical grounds and in whose case on basis of evidence during the trial, there remained a reasonable suspicion about their integrity.
भारत सरकार ने इस संद्धर्भ में 28 अक्तूबर 1969 को एक 12 पन्नों का गोपनीयता पत्र जारी करके विस्तृत दिशा निर्देश जारी किये हुए हैं। इस पत्र के बाद हिमाचल सरकार ने 6 जून 1985 को पांच पन्नों के निर्देश जारी किये हैं प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी CWP No. 4916/2010 के माध्यम से सरकार को इस संद्धर्भ में गंभीर लताड़ लगाई हुई है। बल्कि इस लताड़ के बाद भी सरकार ने 2011 में नये सिरे से दिशा निर्देश जारी किये हैं।
इन सारे निर्देशों को सामने रखने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रबोध सक्सेना प्रकरण में सरकार सारे दिशा निर्देशों की पूरी तरह अनदेखी कर रही है। इस पर यह सवाल उठना भी स्वभाविक है कि जयराम सरकार आखिर ऐसा कर क्यों रही है। क्या सरकार को इसमें सही राय नहीं मिल रही है या फिर सरकार सक्सेना को सरकारी गवाह बनाने का प्रयास कर रही है। सरकारी गवाह बनने के लिये भी पहले अपना दोष स्वीकारना पड़ता है। उसके बाद क्षमा की गुहार लगानी पड़ती है। इस सबके लिये भी अदालत से अनुमति लेनी पड़ती है। यदि अदालत इसकी अनुमति दे भी दे तो भी अप्रैल 2011 में जारी निर्देशों के अनुसार सक्सेना को ओडीआई सूची से बाहर निकालना संभव नही होगा और न ही उसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी दी जा सकेगी। ऐसे में यह अलग सवाल उठना शुरू हो गया है कि क्या सरकार का शीर्ष प्रशासन क्या टाईम पास करने और मौज काटने की नीति पर चल रहा है जबकि अभी तीन अक्तूबर को ही एक मामले में प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी अराजकता फैलाने की टिप्पणी की है।





क्या 16 अक्तूबर को धर्मशाला में इन्वैस्टर मीट की प्रस्तावित समीक्षा बैठक आचार संहिता का उल्लंघन नही है इन्वैस्टर मीट के पोस्टरों पर मुख्यमन्त्री के फोटो का चुनाव आयोग ने लिया कड़ा संज्ञान-हटाने के दिये निर्देश
शिमला/शैल। इन उपचुनावों में सरकारी तन्त्र का दुरूपयोग होने का आरोप लगना शुरू हो गया है। इस संद्धर्भ में एक मामला दर्ज भी हो गया है। दूसरे में मामला दर्ज होने के कगार पर है और तीसरे विधानसभा अध्यक्ष डाॅ. बिन्दल के मामले में नोटिस जारी हो चुका है। पच्छाद में दो बार आईपीएच विभाग द्वारा चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद पानी की पाईपों के दो ट्रक पकड़े गये हैं। विधानसभा अध्यक्ष चुनाव प्रचार कर रहे हैं उनके प्रचार करने को मुख्यमन्त्री ने यह कह कर जायज ठहराया है कि जब बहुमत की सरकार होती है तो ऐसा किया जा सकता है और अन्य प्रदेशों में भी अध्यक्ष चुनाव प्रचार करते हैं। मुख्यमन्त्री का यह कहना कितना तर्क संगत है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरकार बनती ही बहुमत से है और रहती भी तभी तक जब तक उसे बहुमत हासिल रहता है। लेकिन विधानसभा अध्यक्ष पूरे सदन का संरक्षक होता है और इसीलिये उसे निष्पक्ष रहना होता है। क्योंकि जब राष्ट्रपति शासन में सरकार चली जाती है और विधानसभा भी भंग कर दी जाती है तब अकेला विधानसभा अध्यक्ष ही अपने पद पर बना रहता है। अध्यक्ष पद की इस गरिमा को बनाये रखना अध्यक्ष और सरकार दोनों की ही जिम्मेदारी होती है परन्तु इस समय ऐसा हो नही पा रहा है।
यही नही चुनाव आयोग ने इन्वैस्टर मीट के पोस्टरों पर से मुख्यमंत्री के फोटो को हटाने के निर्देश जारी किये हुए हैं। इन निर्देशों से यह स्पष्ट हो जाता है कि चुनावों के दौरान इस मीट की तैयारियों का प्रचार-प्रसार आर्दश चुनाव आचार सहिंता के दायरे में आता है जिसका मुख्य निर्वाचन अधिकारी को संज्ञान लेना चाहिये। लेकिन इस संज्ञान से हटकर इस मीट की तैयारियों की समीक्षा बैठक ही 16 अक्तूबर को धर्मशाला में की जा रही है जहां पर उपुचनाव होना है। इस समीक्षा बैठक में सारा शीर्ष प्रशासन मौजूदा रहेगा। नियमों की जानकारी रखने वालों के मुताबिक यह बैठक चुनाव आचार संहिता का सीधा उल्लघंन है। लेकिन मुख्य निर्वाचन अधिकारी इसका संज्ञान नही ले रहे हैं क्योंकि उपचुनावों में वह चुनाव आयोग के साथ-साथ राज्य सरकार में भी कुछ विभागों के सचिव की भी जिम्मेदारी निभा रहे है। कायदे से चुनावों के दौरान मुख्य निर्वाचन अधिकारी को और कोई जिम्मेदारी नही दी जाती है ताकि वह भयमुक्त होकर इस जिम्मेदारी को निभा सके। अभी 10 अक्तूबर को राष्ट्रीय जनजाति आयोग एक दिन की यात्रा पर शिमला आया था। उसने मुख्य सचिव और अन्य सचिवों के साथ बैठक करके एक पत्रकार वार्ता भी कर ली। इस वार्ता में आयोग ने जनजातियों के लिये प्रदेश सरकार द्वारा किये जा रहे कार्यों का पूरा प्रशस्ति पत्र वार्ता में रख दिया। प्रदेश के पच्छाद विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव चल रहा है और इस क्षेत्र का आधा भाग हाटी समुदाय उसे जनजाति दर्जा दिये जाने की मांग कर रहा है। इस उपचुनाव में भी वहां पर यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस परिदृश्य में जनजाति आयोग की उपचुनावों के दौरान प्रदेश मुख्यालय में शीर्ष प्रशासन से बैठक और फिर प्रैसवार्ता करना दोनों आचार संहिता के उल्लंघन के दायरे में आते हैं। लेकिन इस सब पर शीर्ष प्रशासन से लेकर मुख्य निर्वाचन अधिकारी तक सब एकदम खामोश होकर बैठे हुए हैं जबकि चुनावों में प्रशासन की परोक्ष/अपरोक्ष भूमिका पर कोई सवाल न उठें यह उन्हे सुनिश्चित करना होता है। चुनावों के दौरान भी मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास अन्य विभागों का भी दायित्व रहना अपने में सरकार से लेकर चुनाव आयोग तक की नीयत और नीति पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
शिमला/शैल। प्रदेश सरकार के प्रधान सचिव वित्त प्रबोध सक्सेना के खिलाफ आई एन एक्स मीडिया प्रकरण में अभियोग की अनुमति भारत सरकार द्वारा दे दी गयी है। सक्सेना के साथ ही अन्य तीन अधिकारियों के खिलाफ भी यह अनुमति दी गयी है। आई एन एक्स मीडिया प्रकरण में यह सभी अधिकारी पूर्व वित्तमंत्री पी चिदम्बरम के साथ सह अभियुक्त हैं। बल्कि प्रबोध सक्सेना को पदोन्नत करने की भी चर्चा चली हुई है जिससे यह सपष्ट हो जाता है कि राज्य सरकार की नजर में सक्सेना चिदम्बरम आदि के खिलाफ बुनियादी तौर पर मामला सही नही है क्योंकि अभी तक इनमें से किसी की भी गिरफ्तारी इस प्रकरण में नही हुई हैं। जबकि चिदम्बरम इसी मामले में जेल में है। इन अधिकारियों के खिलाफ अब अभियोग की अनुमति आयी है। अभियोग की अनुमति तब मांगी जाती है जब मामले में जांच के बाद अदालत में चालान दायर किया जाना होता है। स्वभाविक है कि इन अधिकारियों के खिलाफ जांच पूरी करके चालान तैयार कर लिया गया है और जांच के दौरान इनकी गिरफ्तारी की आवश्यकता नही समझी गयी। ऐसे में अब यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जिन अधिकारियों की सिफारिश पर चिदम्बरम ने मोहर लगायी है जब उनको ही गिरफ्रतारी लायक नही माना गया तो फिर चिदम्बरम की गिरफ्तारी कैसे?
इसी तरह कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक द्वारा पिछले दिनों मनाली की एक पर्यटन ईकाई को 65 करोड़ का लोन स्वीकृत होने का मामला सामने आया है। यह लोन वीरभद्र शासन में स्वीकृत हुआ था और तब करीब सात करोड़ की एक किश्त ऋणकर्ता कांगड़ा बैंक की राजकीय महाविद्यालय उन्ना की ब्रांच से जारी हो गयी थी। उसके बाद सरकार बदलने के बाद इसे शायद बीस करोड़ की एक किश्त का भुगतान कर दिया गया। यह बीस करोड़ की किश्त मिलने के बाद ऋणी ने इसमें ग्यारह लाख रूपये वाकायदा चैक के माध्यम से विवेकानन्द ट्रस्ट पालमपुर को दान के रूप में दे दिये। शान्ता कुमार इस ट्रस्ट के चेरयमैन हैं उन्होने दान का यह चैक ऋणी को वापिस कर दिया क्योंकि तब तक इस ऋण को लेकर विवाद खड़ा हो चुका था। इसमें सबसे रोचक यह है कि कांगड़ा बैंक के चेयरमैन राजीव भारद्वाज भी इस ट्रस्ट के ट्रस्टी हैं। ऐसे में दान का यह चैक एक प्रकार से रिश्वत बनता है। सर्वोच्च न्यायालय तो रैडक्रास को इस तरह से दान देने को अपराध मानकर सजा दे चुका है। ऐसे में कांगड़ा बैंक का यह लोन और फिर उसमें से दान देना सीधा भ्रष्टाचार का मामला बनता है जिसकी राज्य सरकार को जांच करनी चाहिये थी। लेकिन जयराम सरकार ऐसा नही कर पायी है। माना जा रहा है कि कांग्रेस इस ऋण दान और प्रबोध सक्सेना मामले को इन उपचुनावों में एक मुद्दा बनाकर सरकार को घेर सकती है।
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