Thursday, 04 June 2026
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क्या लैण्ड सिलिंग के चलते 105 एकड़ जमीन खरीद की अनुमति दी जा सकती है इस प्रकरण में बाल्दी,सक्सेना,पालरासू की भूमिका पर उठे सवाल राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और प्रधान न्यायाधीश तक पहुंची शिकायत राज्य सरकार की खामोशी सवालों में

शिमला/शैल। कांगड़ा जिला के योल निवासी अनूप दत्ता ने प्रदेश के तीन बड़े नौकरशाहों श्री कान्त बाल्दी, प्रबोद सक्सेना और पालरासू के खिलाफ महामहिम राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, चीफ जिस्टस आफ इण्डिया, चीफ जस्टिस हिमाचल हाईकोर्ट, महामहिम राज्यपाल और मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर को एक शिकायत भेजी है। शिकायत में इन अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई से जांच करवाने की मांग की गयी है। यह सभी अधिकारी किसी न किसी समय कांगड़ा के जिलाधीश रह चुके हैं। आरोप है कि कांगड़ा में एक गैर कृषक गैर हिमाचली फैज मुर्तज़ा अली को कृषि कार्य के लिये 105 एकड़ ज़मीन खरीद की अनुमति भू -राजस्व अधिनियम की धारा 118 के तहत गैर कानूनी तरीके से दे दी गयी है। शिकायतकर्ता का दावा है कि उसने इस जमीन का सौदा इसके असली मालिक मोहिन्द्र सिंह पुत्र महाराजा पटियाला भूपिन्द्र सिंह से किया था। लेकिन फैज अली ने अधिकारियों के साथ मिलकर धोखाधड़ी से इस जमीन पर बिना किसी कानूनी दस्तावेज के अपना जबरन अधिकार का दावा कर दिया। शिकायतकर्ता ने इस बावत जिलाधीश कांगड़ा और पुलिस अधिकारियों से शिकायत की। इसको लेकर पुलिस थाना पालमपुर में एफआईआर 50/12 और पुलिस थाना धर्मशाला में एफआईआर 97/3 तथा 72/5 दर्ज हैं। इन एफआईआर की उचित जांच किये जाने की बजाये शिकायतकर्ता को ही 24-7-2002 को पुलिस थाना पालमपुर में बिना किसी केस के हवालात में बन्द कर दिया। 25-7-2002 को पंजाब पुलिस की वर्दी में आयें कुछ लोगों ने उसका अपहरण तक कर दिया। इस सबकी शिकायतें की गयी लेकिन कोई कारवाई नही की गयी।
शिकायतकर्ता के मुताबिक 6-8-2002 को पत्र संख्या त्मअ-ठथ्;10द्ध 248/ 2002 को गैर कृषक, गैर हिमाचली के नाम 105 एकड़ ज़मीन कृषि कार्य के लिये खरीदने का अनुमति पत्र तैयार किया गया। राजस्व विभाग का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सरकारों में इस खरीद की अनुमति दी गयी है। शिकायतकर्ता अनूप दत्ता का दावा है कि उसने 27 मई 2019 को एडीजीपी विजिलैन्स को और 29 जुलाई 2019 को मुख्य सचिव को इस बारे में पत्र लिखा परन्तु कोई कारवाई नही हुई। इसके बाद उसने 18-8-2019 को एक और शिकायत पत्रा भेजा। इस पत्रा पर एसपी कांगड़ा ने डीआईजी को पत्र लिखा है। इस पत्र में एसपी ने माना है कि वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ गंभीर मामले उठाये गये हैं जिनका बड़े स्तर पर असर पड़ेगा इसलिये इस सबकी एक सघन जांच होनी चाहिये। एसपी कांगड़ा द्वारा डीआईजी को लिखे पत्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि शिकायतकर्ता ने इन बड़े अधिकारियों के खिलाफ संगीन आरोप लगाये हंै और इन आरोपों की अभी तक कोई जांच नही हुई है। आरोपों में सच्चाई है या नही इसका पता तो जांच से ही चलेगा। यह शिकायतें भी लम्बे अरसे से चली आ रही हैं। जिन पर अब प्रार्थी को महामहिम राष्ट्रपति से लेकर शीर्ष अदालत तक का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर तक शिकातय पहुंची है लेकिन अभी तक कोई कारवाई न होना अपने में कई सवाल खड़े करता है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम सवाल यह सामने आता है कि जब प्रदेश में लैण्ड सिलिंग एक्ट लागू किया गया था तब इसके प्रावधानों के मुताबिक एक व्यक्ति अपने पास ज्यादा से ज्यादा 101बीघे/300 कनाल ज़मीन रख सकता है। लैण्ड सिलिंग में अधिकतम भू-सीमा की छूट केवल बागीचा धारकों को दी गयी थी। जिन लोगों/किसानों/बागवानों के बागीयों की राजस्व रिकार्ड में बतौर बागीचा एन्ट्री दर्ज थी उन्हंे यह छूट हासिल थी। लेकिन ऐसा व्यक्ति जब बागीचा बेचना चाहेगा तो उसे सरकार से इसकी अनुमति लेनी होगी और तब उस पर लैण्ड सिलिंग के प्रावधान लागू होंगे। यदि कोई गैर कृषक व्यक्ति कृषि कार्य के लिये ज़मीन खरीदना चाहता है तो वह केवल चार एकड़/चालीस कनाल ही खरीद सकता है। इस प्रावधान के तहत फैज़ अली चार एकड़ से ज्यादा जमीन नही खरीद सकता है। उसे धारा 118 के तहत ऐसी अनुमति दी ही नही जा सकती थी। इसलिये यह स्वभाविक है कि यदि फैज अली को 105 एकड़ खरीद की अनुमति दी गयी है तो वह एकदम नियमों के विरूद्ध है। यदि उसने धोखाधड़ी करके 105 एकड़ पर कब्जा करने का प्रयास किया है तब उसका अपराध दोगुणा हो जाता है। इस 105 एकड़ खरीद की अनुमति किसी भी नियम के तहत दिया जाना संभव ही नही है। ऐसे में अनूप दत्ता की शिकायत से स्पष्ट हो जाता है कि या तो इन अधिकारियों को राजस्व निमयों की जानकारी ही नही थी या फिर इन्होने किन्ही निहित कारणों से यह सब होने दिया और सरकार को नुकसान पहुंचाया। अब जब यह शिकायत राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्राी और सर्वोच्च न्यायालय/ प्रदेश उच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीशों तक पहुंच गयी है तब इस पर किस तरह से आगे कारवाई की जाती है या एक बार फिर इस मसले को दबा दिया जाता है यह देखना रोचक होगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जयराम सरकार ने एक वर्ष में खरीदी 229 गाड़ियां ‘ऋणम कृत्वा घृतं पिवेत’ को किया चरितार्थ राज्यपाल के लिये आयी 70 लाख की गाड़ी

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने सत्ता संभालने के बाद पहले ही वर्ष में 15 जनवरी 2019 तक 229 गाड़ियां राजनेताओं और अधिकारियों के लिये खरीदी है। इनमें राजभवन के लिये दो गाड़ियां एक 18,03,600 तो दूसरी 70,00,000 रूपये की खरीदी गयी हैं। सचिवालय के लिये सात गाड़ियां 2,22,50,266 रू. में ली गयी है। सचिवालय के लिये यह खरीद बैगंलूर की कंपनी किर्लोस्कर मोटर प्रा.लि. के माध्यम से की गयी है। नयी गाड़ियां पाने वालों में राज्य शिक्षा बोर्ड, राज्य कृषि बोर्ड, राज्य सूचना आयोग, योजना सलाहकार और आयुर्वेद बोर्ड शामिल हैं। इन सभी को टोयटा गाड़ियां दी गयी है। जिनकी कीमत 31 लाख से 36 लाख तक प्रति गाड़ी रही है। इन सभी अदारों को यह महंगी गाड़ियां इसलिये दी गयी हैं क्योंकि सरकार बदलने के बाद इनमें नयी ताजपोशीयं हुई थी। सचिवालय में शायद मंत्रीयों के लिये नयी गाड़ियां खरीदनी पड़ी है। सरकार द्वारा नयी गाड़ियां को खरीदने को लेकर मुख्यमंत्री द्वारा वर्ष 2018-19 का बजट सदन में पेश करने के बाद विधानसभा में ही हुई पत्रकार वार्ता में भी सवाल पूछा गया था जिसे अधिकारियों ने टाल दिया था। अब यह जानकारी विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पूछे गये एक सवाल के जवाब में सामने आयी है। ऐसा नही है कि 15 जनवरी 2019 के बाद नयी गाड़ियां नही खरीदी गयी है। अब भी मंहगी गाड़ियां लगातार खरीदी जा रही है। यही नहीं घाटे में चल रही  एचआरटीसी ने तो इलैक्ट्रिक कार मुख्यमंत्री को भेंट की है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां कर्ज लेकर खैरात बांटने की कहावत लागू होती है।
 आज यह विषय इसलिये महत्वपूर्ण हो जाता है कि सरकार को लगभग हर माह कर्ज उठाने की आवश्यकता पड़ती रही है। यही नही पैट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढ़ानी पड़ी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब सरकार की वित्तिय स्थिति मजबूत नही है तो फिर क्या इन गाड़ियों की खरीद पर करोड़ों रूपया खर्च करने की एकदम जरूरत क्यों पड़ गयी। क्या इन गाड़ियों के बिना सरकार का काम नही चल रहा था। मुख्यमंत्री के सत्ता संभालते ही प्रशासन ने चण्ड़ीगढ़ में हिस्सेदारी के दावे को लेकर बड़े- बड़े ब्यान दिलवाये थे। यह संदेश दिया गया था कि सर्वोच्च न्यायालय में लंबित चल रहे मामले को कुछ ही दिनों में निपटाकर प्रदेश की माली हालत को मजबूत कर लिया जायेगा। मीडिया ने भी इन दावों को बड़ी उपलब्धि बनाकर जनता में परोसा था। लेकिन आज दो वर्ष का कार्यकाल पूरा होने पर भी इस दिशा में कोई प्रगति नही है। मुख्यमंत्री से लेकर मीडिया तक सभी मौन होकर बैठ गये हैं उद्योग मंत्री के माध्यम से प्रदेश सरकार ने केन्द्र से चौदह हजार करोड़ की सहायता मांगी है जिस पर आश्वासन तक नही मिला है। ऐसे में प्रदेश को बढ़ते कर्ज से बचाने के लिये कर्ज लेकर घी पीने की आदत को सुधारना होगा।































































































दो वर्षों में अपराध के 30814 मामले आये सामने रेप, महिला अत्याचार, एनडीपीएस और एक्साईज मामलों मे वृद्धि चिन्ताजनक

शिमला/शैल। देवभूमि कहलाये जाने वाले प्रदेश में रेप, महिला अत्याचार और मादक द्रव्यों के मामलों में लगातार वृद्धि होती जा रही है। जनवरी 2018 से 31-7-2019 तक अपराध के 30814 मामले दर्ज हुए हैं। जिनमें रेप 544, एनडीपीएस 2080, अपहरण के 732, महिला अत्याचार 317, अभद्रता 789 और आबकारी के 4351 मामले शामिल हैं। इन अपराधों का इस गति से बढना जहां प्रदेश की कानून और व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है वहीं पर आने वाले समय में सामाजिक संरचना के लिये भी एक चिन्ताजनक संकेत हैं।
इसमें चिन्ताजनक यह भी है कि जांच ऐजैन्सीयों की कार्यशैली भी ऐसे मामलों में सवालों के घेरे में आ जाती है क्योंकि अदालतों में इनकी सफलता अभी तक 43.48% तक ही पहुंच पायी है। अपराध को लेकर जो मामलें भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में दर्ज हैं उसकी सफलता का रेट तो केवल 10.71% ही रहा है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने वाली सबसे बड़ी ऐजैन्सी है। यदि उसके पास आये मामलों की अदालत में सफलता 10% तक ही पहुंच पायी है तो यह सरकार के भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टाॅलरैन्स के दावों पर न केवल सवाल ही खड़े करती है बल्कि उसकी प्रतिबद्धता पर भी अविश्वास पैदा करती है।
आबकारी में तो अपराध का बढ़ना सीधे सरकार के राजस्व को चोट पहुंचाता है। इसमें मामलों का बढ़ना संवद्ध प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है। अपराध के इन 30814 मामलों का जो जिलावार रिकार्ड सामने आया है उसमें कांगड़ा, मण्डी, कुल्लु और शिमला का ग्राफ अन्य जिलों के जनसंख्या अनुपात में ज्यादा बढ़ना अपने में ही गंभीर सवाल खड़े करता है। विभागीय सूत्रों की माने तो शायद बहुत सारे मामलों का तो रिकार्ड पर संज्ञान ही नही लिया जाता है। यह आम चर्चा है कि नशे के बढ़ते कारोबार को कहीं न कहीं राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। इसके लिये सोलन में एक बड़े राजेनता की गाड़ी से चिट्टा बरामद करके नेता की गाड़ी को रिकार्ड से हटा देना और केवल ड्राईवर के खिलाफ मामला बनाना। बीबीएन से पिछले दिनों एसपी की ट्रांसफर और मण्डी में उस इन्सपैक्ट का दूसरे ही दिन तबादला कर देना जिसने नशे के कारोबारियों के खिलाफ हाथ डाला था संरक्षण के बड़े संकेतक माने जा रहे हैं।

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